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जिस हीरो पर आंख मूंदकर भरोसा करती थी पूरी इंडस्ट्री — राजेंद्र कुमार की वो बात जो उन्हें "जुबिली कुमार" बना गई!

युवान बंसल 09 Sep 2026 3,467 views

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ये उस अभिनेता की कहानी है जिसके नाम पर सिर्फ़ स्क्रिप्ट साइन हो जाती थी, और जिसकी मौजूदगी भर से एक फ़िल्म की क़िस्मत तय मान ली जाती थी।

साधना जी उस दिन बहुत बेचैन थीं। सामने था हरनाम सिंह रवैल साहब का ऑफ़र, पर मन में डर बैठा था — रवैल साहब की पिछली फ़िल्म "रूप की रानी चोरों का राजा," जिसमें देव आनंद और वहीदा रहमान जैसे बड़े नाम थे, वो भी बुरी तरह पिट चुकी थी। तो अब ये नई फ़िल्म साइन करूं या न करूं? इसी उलझन में साधना जी पहुंचीं ऋषिकेश मुखर्जी के पास। ऋषि दा ने बस इतना कहा — "बेझिझक साइन कर लो, क्योंकि हीरो राजेंद्र कुमार है, और वो कभी कोई ख़राब स्क्रिप्ट साइन नहीं करता।" साधना जी ने वो सलाह मान ली। फ़िल्म बनी, रिलीज़ हुई, और बॉक्स ऑफ़िस पर धमाल मचा गई। नाम था "मेरे महबूब," साल था 1963। और यही एक किस्सा बता देता है कि राजेंद्र कुमार का नाम उस दौर में क्या मायने रखता था — एक ऐसा भरोसा जिसकी बुनियाद पर लोग बिना सोचे फ़िल्में साइन कर लेते थे।

राजेंद्र कुमार जी को इंडस्ट्री और दर्शक, दोनों प्यार से "जुबिली कुमार" पुकारते थे — क्योंकि उनकी इतनी फ़िल्में लगातार सिल्वर या गोल्डन जुबिली मनाती रहीं कि ट्रेड के लोगों ने ये नाम ही उनके साथ चस्पा कर दिया। 12 जुलाई, 1999 को, 71 साल की उम्र में, मुंबई में उनका निधन हो गया था — कैंसर से जूझते हुए, और वो भी बिना कोई दवा लिए, क्योंकि दवाइयां लेने से वो हमेशा कतराते थे। दिलचस्प बात ये भी है कि उनका निधन उनके बेटे कुमार गौरव के 43वें जन्मदिन के ठीक अगले दिन हुआ था, और उनकी अपनी 71वीं सालगिरह से बस कुछ ही दिन पहले। आइए आज उसी जुबिली कुमार की पूरी कहानी को क़रीब से देखें।

सियालकोट से बॉम्बे तक — बंटवारे ने जो छीना, मेहनत ने वापस दिया

राजेंद्र कुमार जी का जन्म हुआ था — असली नाम राजेंद्र कुमार तुली — 20 जुलाई, 1927 को, नारोवाल में, जो उस वक़्त पंजाब प्रांत का हिस्सा था और आज पाकिस्तान में है। एक पंजाबी हिंदू खत्री परिवार में जन्मे राजेंद्र कुमार का बचपन सियालकोट के पास संखत्रा गांव में बीता। उनके दादा चज्जूराम तुली एक कामयाब मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर थे, और पिता का कराची में कपड़े का कारोबार था। पर बंटवारे ने सब कुछ बदल दिया — परिवार को अपनी ज़मीन-जायदाद पीछे छोड़कर भारत आना पड़ा। दिलचस्प बात ये है कि एक मुस्लिम मोहल्ले में पले-बढ़े होने की वजह से राजेंद्र कुमार जी की कई गहरी दोस्तियां उसी समुदाय में थीं — एक ऐसा बचपन जिसने शायद आगे चलकर उनके किरदारों में वो नरमी और संजीदगी भर दी जिसके लिए वो जाने गए।

फ़िल्म इंडस्ट्री में उनकी शुरुआत 1949 में हुई, और वो भी बड़े रोल से नहीं — "पतंगा" (1949) और "जोगन" (1950) में उन्होंने बहुत छोटे सपोर्टिंग रोल किए। दिलचस्प ये है कि राजेंद्र कुमार जी ख़ुद कभी लीड हीरो बनना नहीं चाहते थे — उन्होंने कुछ समय असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर भी काम किया। पर क़िस्मत को कुछ और मंज़ूर था। "जोगन" में उनके काम को देखकर प्रोड्यूसर देवेंद्र गोयल जी की नज़र उन पर पड़ी, और उन्होंने राजेंद्र कुमार को अपनी फ़िल्म "वचन" (1955) में बतौर लीड हीरो लॉन्च किया। ये फ़िल्म उनकी पहली सिल्वर जुबिली हिट साबित हुई — और यहीं से शुरू हुआ वो सिलसिला जिसने उन्हें आगे चलकर "जुबिली कुमार" का ख़िताब दिलाया।

वो दौर जब हर फ़िल्म जुबिली मनाती थी

1960 के दशक में राजेंद्र कुमार जी का करियर अपने पूरे उरूज पर था। एक के बाद एक उनकी फ़िल्में कामयाब होती गईं — "धूल का फूल," "मेरे महबूब," "संगम," "सूरज," "आरज़ू," "अमन," "गंवार," "दिल एक मंदिर," "साजन बिना सुहागन" — फ़ेहरिस्त लंबी है। उनकी सबसे यादगार फ़िल्मों में तीन का नाम बार-बार लिया जाता है — "मेरे महबूब" (1963), "संगम" (1964) और "आरज़ू" (1965)। "मेरे महबूब" में उन्होंने एक शायर अनवर हुसैन अनवर का किरदार निभाया, जो एक नक़ाबपोश महिला (साधना जी) से मोहब्बत कर बैठता है — इस किरदार ने उस दौर की न जाने कितनी लड़कियों के दिल में जगह बनाई। "संगम" में उन्होंने राज कपूर और वैजयंतीमाला के साथ उस मशहूर लव-ट्राएंगल में एक ऐसे दोस्त का किरदार निभाया जो अपने ही सबसे क़रीबी दोस्त और अपनी मोहब्बत के बीच फंसा है। और "दिल एक मंदिर" (1963) में उनके किरदार ने उन्हें करियर का पहला फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट एक्टर नॉमिनेशन दिलाया — इसमें वो एक डॉक्टर बने थे जो अपनी ही महबूबा (मीना कुमारी) के पति (राज कुमार) का जानलेवा ऑपरेशन करता है।

1970 में, महज़ चालीस के आस-पास की उम्र में, उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया — ये दिखाता है कि उनका असर सिर्फ़ बॉक्स ऑफ़िस तक सीमित नहीं था, सरकार ने भी उनके योगदान को माना। कहा जाता है कि उस दौर में कुंवारी लड़कियां राजेंद्र कुमार जैसा पति पाने की दुआ मांगती थीं, और शादीशुदा औरतें अपने बेटे को उन्हीं की तरह बनते देखना चाहती थीं। ऐसी दीवानगी उस दौर के बहुत कम अभिनेताओं के हिस्से आई थी।

नौशाद साहब को मनाने वाला हीरो

"मेरे महबूब" का संगीत नौशाद साहब ने दिया था, और दिलचस्प बात ये है कि नौशाद साहब को इस फ़िल्म का संगीत कंपोज़ करने के लिए राज़ी करने का काम ख़ुद राजेंद्र कुमार जी ने किया था। जिस दिन नौशाद साहब फ़िल्म का टाइटल ट्रैक कंपोज़ कर रहे थे, उस दिन रवैल साहब भी स्टूडियो में मौजूद थे। नौशाद साहब को महज़ चार-पांच म्यूज़िशियन्स के साथ इतना अहम गाना कंपोज़ करते देखकर रवैल साहब हैरान-परेशान हो उठे। वो सीधे नौशाद साहब से तो कुछ नहीं बोले, पर राजेंद्र कुमार जी के पास पहुंचकर अपनी चिंता ज़ाहिर की। राजेंद्र कुमार जी ने उन्हें भरोसा दिलाया — "नौशाद साहब सोच-समझकर ही कर रहे होंगे, आप नतीजा देखिएगा।"

और नतीजा वाक़ई सबकी उम्मीदों से बढ़कर निकला। जब गाना बनकर तैयार हुआ, तो हर किसी को बेहद पसंद आया, और यही गाना फ़िल्म के तमाम गीतों में सबसे पहले रिकॉर्ड भी किया गया। बाद में जब राजेंद्र कुमार जी ने नौशाद साहब को बताया कि रवैल साहब उस दिन कितने परेशान हो रहे थे, तो नौशाद साहब मुस्कुराए और बोले — "जब कोई शायर अपनी ख़ुद की लिखी नज़्म या ग़ज़ल स्टेज पर पढ़ता है, तो उसके पीछे कोई बड़ा ऑर्केस्ट्रा नहीं होता। हमने इसी बात को ध्यान में रखकर वो गाना सिर्फ़ चार-पांच म्यूज़िशियन्स के साथ कंपोज़ किया था।" ये एक ऐसा जवाब है जो आज भी संगीत के छात्रों को पढ़ाया जाना चाहिए — कभी-कभी कम साज़ ज़्यादा असर छोड़ते हैं, बस समझ सही होनी चाहिए।

जब एक हीरो ने शहनाई बजाना "सीखे बिना" सीख लिया

1959 में आई विजय भट्ट की "गूंज उठी शहनाई" राजेंद्र कुमार जी की एक और बड़ी कामयाब फ़िल्म रही, जिसमें उन्होंने एक शहनाई वादक का किरदार निभाया। इस किरदार के लिए उन्होंने ख़ुद उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान से सीखा कि शहनाई बजाते वक़्त एक वादक की भाव-भंगिमा कैसी होती है। उन्होंने अपने लिए एक शहनाई भी बनवाई थी, और रोज़ शीशे के सामने खड़े होकर, उस्ताद जी की नक़ल करते हुए, शहनाई बजाने की एक्टिंग का अभ्यास करते थे — सिर्फ़ अभ्यास, क्योंकि असल में शहनाई बजाना सीखना उस वक़्त उनके लिए मुमकिन नहीं था; इसके लिए बरसों की साधना चाहिए होती है।

जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान साहब को भी प्रीमियर पर बुलाया गया। फ़िल्म ख़त्म होने के बाद, राजेंद्र कुमार जी ने हिचकिचाते हुए उनसे पूछा — "मैं आपको कैसा लगा?" उस्ताद जी का जवाब आज भी फ़िल्मी हलकों में दोहराया जाता है — "अरे भई, हमने तो तुम्हें देखा ही नहीं। हम तो अपने आप को देख रहे थे।" इससे बड़ी तारीफ़ किसी अभिनेता के लिए और क्या हो सकती है, कि जिस उस्ताद की नक़ल की जाए, वो ख़ुद अपने आप को स्क्रीन पर देखने लगे।

वो फ़िल्म जिसमें एक भी गाना नहीं था

1960 में बी.आर. चोपड़ा साहब ने "कानून" बनाई — भारत की पहली फ़िल्म जिसमें एक भी गाना नहीं था, ऐसे दौर में जब हर फ़िल्म का दारोमदार उसके गानों पर ही टिका होता था। ये एक बड़ा जोखिम था, पर फ़िल्म ख़ूब चर्चा में रही। राजेंद्र कुमार जी ने ख़ुद एक बार याद किया था कि फ़िल्म की कामयाबी का जश्न मनाने के लिए बी.आर. चोपड़ा जी ने एक बड़ी महफ़िल रखी थी, जिसमें इंडस्ट्री के कई बड़े सितारे और नामचीन हस्तियां शरीक हुई थीं। उस दौर के बॉम्बे हाईकोर्ट के एक जज साहब को भी उस महफ़िल में बुलाया गया था, और कलाकारों को ट्रॉफ़ियां भी उन्हीं के हाथों दिलवाई गई थीं। अपनी स्पीच में उन जज साहब ने कहा था — "मैंने अपने पूरे करियर में अशोक कुमार जैसा जज नहीं देखा, और राजेंद्र कुमार जैसा वकील नहीं देखा।" (फ़िल्म में अशोक कुमार जज बने थे और राजेंद्र कुमार वकील।) एक असली जज का ये कहना कि फ़िल्मी किरदार असली से ज़्यादा असरदार लगे, अपने आप में इस फ़िल्म की तारीफ़ का सबसे बड़ा सबूत है।

घर की दुनिया — एक बेटा जो पिता के नाम से आगे निकला

राजेंद्र कुमार जी की शादी शुक्ला तुली जी से 1954 में हुई थी। उनके तीन बच्चे हुए, जिनमें एक हैं कुमार गौरव, जो ख़ुद फ़िल्म इंडस्ट्री में आए। कुमार गौरव की शादी शुरुआत में राज कपूर की बेटी रीमा से तय हुई थी, पर बात नहीं बन पाई — बाद में उनकी शादी सुनील दत्त और नर्गिस जी की बेटी नम्रता दत्त से हुई। राजेंद्र कुमार जी ने अपने बेटे को लॉन्च करने के लिए फ़िल्म "लव स्टोरी" प्रोड्यूस की थी, और बाद में एक और कामयाब फ़िल्म "नाम" भी प्रोड्यूस की, जिसमें कुमार गौरव के साथ संजय दत्त भी थे। राजेंद्र कुमार जी ने आगे चलकर पीएचडी की डिग्री भी हासिल की, और उनके नाम के आगे "डॉक्टर" की उपाधि भी जुड़ी। उनके भाई वीरेंद्र कुमार भी फ़िल्म प्रोड्यूसर थे, जिन्होंने "मामा भांजा" और "राज़" जैसी फ़िल्में बनाईं।

आख़िरी दिन, और वो विरासत जो आज भी चमकती है

राजेंद्र कुमार जी की तबीयत उनके आख़िरी सालों में लगातार बिगड़ती गई, कैंसर की वजह से। मगर कहा जाता है कि वो दवाइयां लेने से हमेशा कतराते रहे। आख़िरकार, 12 जुलाई, 1999 को, मुंबई में उनका निधन हो गया — अपने बेटे कुमार गौरव के 43वें जन्मदिन के ठीक एक दिन बाद, और अपनी ख़ुद की 71वीं सालगिरह से बस कुछ दिन पहले। चार दशकों से ज़्यादा लंबे करियर में उन्होंने अस्सी से ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया, और भारतीय सिनेमा के सबसे कामयाब व सबसे सम्मानित अभिनेताओं में गिने जाते हैं।

आज जब भी पुराने दौर की बात होती है, "जुबिली कुमार" का नाम एक ऐसे भरोसे का प्रतीक बनकर उभरता है जो शायद ही किसी और अभिनेता के हिस्से आया हो — एक ऐसा नाम जिस पर साधना जी जैसी बड़ी अदाकारा भी बिना सोचे भरोसा कर लेती थीं, और जिसकी मौजूदगी भर से फ़िल्म की क़िस्मत तय मान ली जाती थी। उनकी फ़िल्में आज भी दूरदर्शन और पुराने गानों के शौक़ीनों के बीच उतनी ही चाव से देखी-सुनी जाती हैं, और यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी कामयाबी होती है — कि उसका काम उसके जाने के बरसों बाद भी ज़िंदा रहे।

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