क्या सच में लोगों ने हरीश पटेल को मरा हुआ समझ लिया था?
एक कलाकार जिसे बरसों नज़रअंदाज़ किया गया, अचानक हॉलीवुड के एक ट्रेलर की दो सेकंड की झलक से फिर याद आ गया — मगर उससे पहले, दुनिया ने उसे भुला ही तो दिया था।
"मुझे हैरत होती है कि लोग ऐसी बातें किस तरह से मान लेते हैं। मुझे मरा हुआ समझ लिया था लोगों ने," — 2021 के एक इंटरव्यू में हरीश पटेल जी ने ये बात कही थी, और आवाज़ में हल्की सी झुंझलाहट भी थी। उनका कहना था कि गूगल सर्च करना भी शायद किसी को ज़रूरी नहीं लगा। बस इसलिए कि वो अब हिंदी फ़िल्मों की स्क्रीन पर नहीं दिख रहे थे, यहां काम नहीं कर रहे थे, तो लोगों ने मान लिया कि वो अब इस दुनिया में हैं ही नहीं। ये बात उस साल हुई थी जब मार्वल की बहुचर्चित फ़िल्म इटर्नल्स का ट्रेलर आया, और उसमें हरीश जी की महज़ दो सेकंड की झलक दिखी। बस इतना काफ़ी था। भारतीय दर्शकों में हलचल मच गई। मीम्स बनने लगे, और लोग गुंडा फ़िल्म में उनके निभाए किरदार ईबू हटेला को याद करने लगे — वो किरदार जिसके डायलॉग्स आज भी इंटरनेट पर ज़िंदा हैं। मगर दिलचस्प बात ये है कि जो लोग उन्हें "भुला हुआ" समझ रहे थे, उन्हें शायद ये पता ही नहीं था कि हरीश पटेल पिछले कई सालों से पश्चिम में सक्रिय रूप से काम कर रहे थे — बस हिंदी सिनेमा से दूर।
शुरुआत सीरियस सिनेमा से, फिर सी-ग्रेड की दुनिया तक का सफ़र
अब ज़रा पीछे चलते हैं। हरीश पटेल का जन्म 5 जुलाई 1953 को मुंबई में हुआ था। महज़ सात साल की उम्र में उन्होंने रामायण में स्त्री और पुरुष, दोनों तरह के किरदार निभाकर अभिनय की दुनिया में क़दम रखा था। मगर बड़े पर्दे पर उनकी असली शुरुआत हुई 1983 में, श्याम बेनेगल साहब की फ़िल्म मंडी से। ये कोई मामूली शुरुआत नहीं थी — श्याम बेनेगल का नाम ही समांतर सिनेमा की गंभीरता और गहराई का पर्याय माना जाता था। मंडी के बाद हरीश जी ने उत्सव, आघात, डकैत और मिर्च मसाला जैसी कई आर्ट फ़िल्मों में काम किया। यानी करियर की शुरुआत में उन्हें अभिनय की गंभीर, संजीदा दुनिया में हाथ आज़माने का भरपूर मौक़ा मिला। लेकिन 1980 के दशक की शुरुआत में ही वो कमर्शियल सिनेमा की तरफ़ भी मुड़ गए — मिस्टर इंडिया, मैंने प्यार किया, बिल्लू बादशाह, थानेदार, बोल राधा बोल, शोला और शबनम, आंखें और सैनिक जैसी कई फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया। फिर आया नब्बे के दशक का आख़िरी दौर, जब उनके करियर का ग्राफ़ नीचे जाने लगा। इसी दौर में हरीश जी कांति शाह जैसे डायरेक्टरों की सी-ग्रेड फ़िल्मों में नज़र आने लगे — जिनमें गुंडा भी शामिल थी। यहां एक बात साफ़ कर देना ज़रूरी है — हरीश जी अकेले नहीं थे जो कांति शाह की फ़िल्मों में काम कर रहे थे। उनसे भी बड़े क़द के कई कलाकार उस दौर में कांति शाह के साथ काम कर चुके थे। कहा जाता है कि कांति शाह कलाकारों को बहुत अच्छा पारिश्रमिक देते थे, और उनका भुगतान बिल्कुल साफ़-सुथरा होता था — शूटिंग ख़त्म, और उसी वक़्त कलाकार के हाथ में पैसा। ये बात अपने आप में उस दौर के इंडस्ट्री के हालात के बारे में बहुत कुछ कह जाती है।
गुंडा फ़िल्म में हरीश पटेल का किरदार ईबू हटेला था, और उसके संवाद बरसों बाद भी इंटरनेट पर ज़िंदा रहे — ख़ासकर तब, जब यूट्यूब शो "प्रिटेंशियस मूवी रिव्यूज़" में इन डायलॉग्स का ज़िक्र हुआ और नई पीढ़ी के दर्शकों तक ये किरदार दोबारा पहुंचा। ये किसी भी एक्टर के लिए एक अजीब लेकिन दिलचस्प अनुभव होता है — दशकों पुरानी एक सी-ग्रेड फ़िल्म का किरदार, इंटरनेट के दौर में अचानक नए सिरे से मशहूर हो जाना।
पाइनवुड स्टूडियो, ऑडिशन, और एक अनजान महिला की आवाज़
अब बात करते हैं उस किस्से की, जिसने हरीश पटेल को नए सिरे से चर्चा में ला दिया। मार्वल की टीम ने उन्हें इटर्नल्स के लिए ऑडिशन का मौक़ा दिया, और वो लंदन के मशहूर पाइनवुड स्टूडियो पहुंचे। हरीश जी ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया कि जब उनका ऑडिशन ख़त्म हुआ, वो होटल के लिए निकलने ही वाले थे कि एक असिस्टेंट डायरेक्टर ने उन्हें रोक लिया — टेबल रीड के लिए रुकने को कहा गया। उस वक़्त तक हरीश जी को ज़ोर की भूख लग चुकी थी। उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर से साफ़ कह दिया कि उन्हें कुछ खाना चाहिए, बहुत देर से कुछ नहीं खाया। असिस्टेंट उन्हें एक डाइनिंग हॉल में ले गया, जहां खाने का पूरा इंतज़ाम था। हरीश जी ने प्लेट में खाना लिया और खाने बैठ गए। तभी पीछे से किसी ने उनके कंधे पर हाथ रखा और एक मीठी सी आवाज़ में कहा — "कॉन्ग्रैचुलेशन्स।" हरीश जी ने पलटकर देखा — एक ख़ूबसूरत महिला वहां खड़ी थी, जो उन्हें फ़िल्म में सिलेक्ट होने पर बधाई देने आई थी। उन्होंने शुक्रिया कहा, और जब वो महिला चली गई, तब उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर से पूछा कि आख़िर वो कौन थीं। जवाब मिला — वो मशहूर हॉलीवुड अभिनेत्री सलमा हायेक थीं। हरीश जी ने बाद में हंसते हुए माना कि उस वक़्त उन्हें सलमा हायेक को पहचानने में देर लगी, क्योंकि उन्होंने उनकी फ़िल्में देखी ही नहीं थीं — पूरी कास्ट में सिर्फ़ एंजेलीना जोली का नाम उन्हें पहले से पता था। ज़रा सोचिए — बरसों तक सी-ग्रेड सिनेमा की दुनिया में मेहनत करने वाला एक कलाकार, अचानक हॉलीवुड के सबसे बड़े प्रोडक्शन हाउस के सेट पर खड़ा है, और उसे बधाई देने वाली ख़ुद एक अंतरराष्ट्रीय स्टार है — जिसे वो पहचान भी नहीं पाता। ये फ़िल्मी दुनिया की उन चंद कहानियों में से एक है, जो सच में किसी पटकथा से कम नहीं लगती।
अब भारत में सक्रिय नहीं, पर पहचान वापस मिल गई
इटर्नल्स के बाद से हरीश पटेल भारत में एक्टिव नहीं रहे। सच कहें तो, वो लंबे समय से भारतीय सिनेमा से दूरी बनाए हुए हैं और मुख्य रूप से अंग्रेज़ी फ़िल्मों व शोज़ में ही काम कर रहे हैं। बहुत से भारतीय दर्शकों को तो ये बात 2021 में इटर्नल्स के ट्रेलर से ही पता चली कि हरीश पटेल हॉलीवुड प्रोडक्शंस का भी हिस्सा रहे हैं — इससे पहले शायद ये जानकारी बहुत सीमित लोगों तक ही थी। यहां एक पल रुककर सोचने वाली बात है — बॉलीवुड में दशकों तक काम करने के बाद भी, एक कलाकार को असली पहचान और सम्मान कभी-कभी घर से हज़ारों मील दूर, किसी और इंडस्ट्री में मिलता है। ये कोई नई बात नहीं है इस दुनिया में, पर हर बार सुनकर एक अजीब सी कसक ज़रूर होती है। खैर, ये तो सबको पता है कि फ़िल्मी दुनिया याददाश्त के मामले में बहुत भरोसेमंद नहीं होती — आज जो चेहरा हर जगह दिख रहा हो, कल वही भीड़ में कहीं खो सकता है। और ठीक इसका उलटा भी उतना ही सच है — जो कलाकार भुला दिया गया समझा जाता है, वो किसी एक ट्रेलर की दो सेकंड की झलक से वापस लौट सकता है, जैसा हरीश पटेल के साथ हुआ। शायद यही वजह है कि हरीश जी की आवाज़ में उस दिन जो झुंझलाहट थी, उसके पीछे एक गहरी सच्चाई भी छुपी थी — कि इस इंडस्ट्री में मौजूदगी और याद रखे जाने के बीच का फ़ासला, अक्सर बस एक स्क्रीन एपियरेंस जितना ही होता है।