वो हीरो जो कभी बन ही नहीं पाया, और फिर घर-घर का "संस्कारी बाबूजी" बन गया?
एक कलाकार, जिसने हीरो बनने का ख्वाब छोड़ा, और उसी छोड़े हुए ख्वाब की राख से एक ऐसी पहचान बना ली जो आज तक मिटी नहीं।
Juhu की किसी तंग गली में, उन दिनों, एक नौजवान अपने बैग में बस एक ही चीज़ लेकर घूमता था — एक सपना, हीरो बनने का। मुंबई शहर ने उसे न पैसा दिया, न वो चमक जिसकी उसे तलाश थी। दी तो सिर्फ़ एक सच्चाई — कि इस शहर में टिके रहने के लिए ख्वाब बदलने पड़ते हैं। वो नौजवान बाद में आलोक नाथ कहलाया, और आज, जब हम उनके जन्मदिन की बात कर रहे हैं, तो कहानी वहीं से शुरू करनी चाहिए जहां से किस्मत ने पहला मोड़ लिया था।
कामाग्नी — वो फ़िल्म जो सबकी याद से मिट गई, पर एक सच नहीं मिटा
1987 में एक फ़िल्म आई थी — कामाग्नी। नाम सुनकर ही अंदाज़ा लग जाता है कि ये किस किस्म की फ़िल्म रही होगी। इसमें आलोक नाथ हीरो थे, और उनकी हीरोइन थीं टीना मुनीम — वही टीना मुनीम जो आगे चलकर अनिल अंबानी से शादी करके टीना अंबानी बन गईं। (सोचिए ज़रा, कितनी अजीब बात है कि आज जिस टीना अंबानी को हम बिज़नेस पार्टीज़ और चैरिटी इवेंट्स में शालीन साड़ियों में देखते हैं, कभी उन्होंने आलोक नाथ के साथ एक ऐसी फ़िल्म में काम किया था जिसमें बोल्ड दृश्य थे।) कामाग्नी में दोनों के बीच कुछ हॉट सीन भी फ़िल्माए गए थे — उस दौर के हिसाब से ये फ़िल्म काफ़ी बोल्ड मानी गई थी। मगर टिकट खिड़की पर ये फ़िल्म बुरी तरह पिट गई।
कहा जाता है कि कामाग्नी की नाकामी के बाद आलोक नाथ इतने निराश हो गए थे कि उन्होंने कुछ हफ़्तों तक किसी प्रोड्यूसर से मिलना तक बंद कर दिया था। उस वक्त की चर्चा यही थी कि उन्होंने खुद से एक बात कह दी थी — शायद हीरोगिरी उनके नसीब में लिखी ही नहीं। ये कोई नाटकीय फ़ैसला नहीं था, बल्कि एक बहुत ही ठंडे दिमाग़ से लिया गया व्यावहारिक फ़ैसला था, ऐसा उस दौर के करीबी लोग बताते हैं।
हार को हुनर में बदलने की कला
यहीं से आलोक नाथ की असली कहानी शुरू होती है। हीरो बनने का मोह छोड़कर उन्होंने तय किया कि वो चरित्र भूमिकाएं निभाएंगे। एक सीधा, व्यावहारिक हिसाब था उनके पीछे — कम से कम इससे काम मिलता रहेगा, और काम रहेगा तो घर भी चलेगा। ये फ़ैसला जितना सादा लगता है, उतना आसान नहीं था। उस दौर में चरित्र अभिनेता बनना यानी स्टारडम की चमक-दमक से पूरी तरह मुंह मोड़ लेना। पर आलोक नाथ ने ये रास्ता चुना, और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।
फ़िल्मों में तो उन्होंने चरित्र किरदार निभाए ही, टीवी पर भी उतनी ही शिद्दत से काम किया। और दिलचस्प बात ये रही कि उन्होंने लगभग हमेशा अपनी असली उम्र से बड़े किरदार निभाए — प्रौढ़ पिता, बुज़ुर्ग दादा, संस्कारी ससुर। दर्शकों ने उन्हें इन्हीं भूमिकाओं में इतना अपनाया कि "संस्कारी बाबूजी" जैसी छवि उनके नाम के साथ हमेशा के लिए चिपक गई। क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक था, या एक सोची-समझी रणनीति? शायद दोनों।
दिल्ली में जन्मे, पर खगड़िया के नाम से जाने गए
10 जुलाई 1956 — यही है आलोक नाथ जी की असली जन्म तारीख़। और आज उनका जन्मदिन है। अब एक बात जो साफ़ कर देनी ज़रूरी है — ज़्यादातर लोग मानते हैं कि आलोक नाथ बिहार के खगड़िया में जन्मे थे। ये बात सरासर ग़लत है। सच्चाई ये है कि उनका जन्म और परवरिश दिल्ली में हुई। हां, उनका परिवार मूलरूप से खगड़िया, बिहार से ज़रूर ताल्लुक रखता था, पर आलोक नाथ खुद दिल्ली की गलियों में पले-बढ़े। उनका पूरा नाम है आलोक नाथ झा।
उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे, और चाहते थे कि बेटा भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चले — सफ़ेद कोट, स्टेथोस्कोप, और एक सम्मानित मेडिकल करियर। मगर आलोक नाथ का दिल कहीं और अटका था। बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था, और स्कूल के दिनों से ही उन्होंने स्टेज पर परफ़ॉर्म करना शुरू कर दिया था। एक डॉक्टर पिता के घर में पैदा हुआ बेटा, जिसे स्टेथोस्कोप से ज़्यादा स्टेज लाइट्स लुभाती थीं — ये टकराव शायद हर उस घर की कहानी है जहां सपने और सामाजिक अपेक्षाएं आमने-सामने खड़ी होती हैं।
खैर, यह तो सबको पता है कि आगे चलकर आलोक नाथ ने अपनी पहचान बना ही ली — बस उस रास्ते से नहीं, जिसकी उम्मीद उनके पिता को थी, और न ही उस रास्ते से जिसका ख्वाब खुद आलोक नाथ ने मुंबई आकर देखा था। किस्मत ने उन्हें एक तीसरा रास्ता दिखाया, और उसी रास्ते पर चलकर वो दशकों तक भारतीय दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाए रहे।