वो पार्टी जहां सबने तारीफ़ों के पुल बांधे, और फिर गुरुदत्त का दिल हमेशा के लिए टूट गया?
एक शाम, जिसमें जश्न भी था और तारीफ़ें भी, पर उसी के पीछे छिपी थी एक ऐसी हार जिसने एक फ़नकार को अंदर तक तोड़ दिया।
बंगले की रौशनी में उस रात एक अलग ही रौनक थी। देवीदत्त की शादी की खुशी में गुरुदत्त साहब ने अपने घर पर एक शानदार जश्न रखा था, और मेहमानों की फ़ेहरिस्त किसी भी बड़े फ़िल्मी समारोह को मात दे सकती थी। बिमल रॉय, महबूब खान, के. आसिफ़ — उस दौर के वो नाम जिनके इशारे पर इंडस्ट्री चलती थी, उस शाम गुरुदत्त के बंगले में मौजूद थे। खाने के बाद माहौल और भी संगीतमय हो गया, जब पंडित रवि शंकर और उस्ताद विलायत खान साहब ने एक जुगलबंदी पेश की। सितार और सितार की वो टक्कर, वो रात, वो महफ़िल — कुछ ऐसा था जिसे फिर कभी दोहराया नहीं जा सका।
जब गुरुदत्त ने अपने मेहमानों के सामने खोल दी अपनी सबसे प्यारी फ़िल्म
परफॉर्मेंस खत्म होते ही गुरुदत्त ने एक अलग ही कदम उठाया। उन्होंने मेहमानों को अपनी आने वाली फ़िल्म "कागज़ के फूल" के कुछ दृश्य और एक-दो गाने दिखाए। ये कोई साधारण स्क्रीनिंग नहीं थी — ये असल में एक टेस्ट थी। गुरुदत्त जानना चाहते थे कि इंडस्ट्री के सबसे तेज़ और सबसे अनुभवी दिमाग़ इस फ़िल्म को लेकर क्या सोचते हैं। और जवाब उनकी उम्मीद से भी बेहतर आया।
हर तरफ़ से तारीफ़ों की बारिश हो गई। एक मेहमान का कहना था कि इस फ़िल्म से होने वाली कमाई इतनी ज़्यादा होगी कि गुरुदत्त को अपने घर में नई अलमारियां बनवानी पड़ेंगी — सिर्फ़ पैसे रखने के लिए। सोचिए ज़रा, उस रात गुरुदत्त कितने खुश रहे होंगे। एक फ़नकार, जिसने अपने दिल की सबसे गहरी बात कागज़ पर उतारी हो, और जब वो बात इंडस्ट्री के सबसे बड़े नामों को सुनाई जाए, और वो सब तारीफ़ करें — उस पल की खुशी शायद शब्दों में बयां नहीं हो सकती।
कहा जाता है कि उस रात गुरुदत्त इतने आश्वस्त हो गए थे कि उन्होंने अपने करीबी दोस्तों से खुलकर कहा था कि ये फ़िल्म उनके करियर की सबसे बड़ी कामयाबी साबित होगी। ये बात उनके भाई देवीदत्त जी ने खुद एक इंटरव्यू में साझा की थी, और उनके मुताबिक उस रात के बाद गुरुदत्त का आत्मविश्वास आसमान छू रहा था — शायद यही वजह थी कि आगे जो हुआ, उसकी चोट कहीं ज़्यादा गहरी लगी।
और फिर पर्दे पर उतरी हक़ीक़त
पर जब "कागज़ के फूल" थिएटरों में रिलीज़ हुई, तो नतीजा एकदम उलट निकला। जो फ़िल्म एक निजी महफ़िल में इतनी वाहवाही बटोर चुकी थी, वो आम दर्शकों के सामने बुरी तरह फ्लॉप हो गई। गुरुदत्त के लिए ये सिर्फ़ एक फ़िल्म की नाकामी नहीं थी — ये एक भरोसे का टूटना था। एक ऐसा भरोसा जो उन्हें अपनी सबसे निजी, सबसे आत्मकथात्मक फ़िल्म पर था। देवीदत्त जी ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके भाई इस फ़िल्म के फ्लॉप होने से बहुत ज़्यादा दुखी हो गए थे — और उनके मुताबिक, ये झटका गुरुदत्त की ज़िंदगी का सबसे बड़ा झटका साबित हुआ।
देवीदत्त जी की राय में इस फ़िल्म के फ्लॉप होने की एक बड़ी वजह ये थी कि "कागज़ के फूल" एक डायरेक्टर की कहानी थी, न कि किसी हीरो या हीरोइन की। बकौल देवीदत्त, अगर यही कहानी किसी एक्टर के इर्द-गिर्द बुनी गई होती, तो शायद आम दर्शक उससे ज़्यादा आसानी से जुड़ पाते, और फ़िल्म कमर्शियली भी सफ़ल हो जाती। एक फ़िल्ममेकर के अंदरूनी संघर्ष, उसके अहंकार, उसकी तन्हाई — ये सब विषय आज भले ही "आर्ट हाउस सिनेमा" के दायरे में सराहे जाते हों, पर उस दौर के आम दर्शक के लिए ये शायद बहुत भारी विषय था।
गुरुदत्त ने इस फ़िल्म पर दिल खोलकर खर्च किया था — पैसा भी, वक्त भी, और सबसे ज़्यादा अपना जज़्बात भी। और जब फ़िल्म नहीं चली, तो सिर्फ़ पैसा नहीं डूबा, उनका यकीन भी डूब गया। इसके बाद धीरे-धीरे फ़िल्मों में उनकी दिलचस्पी कम होती चली गई। क्या ये सिर्फ़ एक फ़िल्म की नाकामी थी, या एक फ़नकार की अपनी ही सबसे सच्ची कोशिश से हार? इसका जवाब शायद खुद गुरुदत्त के पास भी नहीं था।
आज गुरुदत्त साहब की जन्मशती है। 9 जुलाई, 1925 को आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था। दशकों बाद भी "कागज़ के फूल" को अब भारतीय सिनेमा की सबसे खूबसूरत और सबसे ग़लत समझी गई फ़िल्मों में गिना जाता है — शायद यही किसी सच्ची कला की नियति होती है, वक्त से पहले पैदा होना, और अपने ही दौर में गलत समझा जाना।