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वो हीरो जिसे लाहौर की एक पान की दुकान ने विलेन बना दिया — प्राण साहब की वो शुरुआत जो किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं!

कियारा खुराना 09 Sep 2026 3,466 views

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ये उस अभिनेता की कहानी है जिसकी शख़्सियत इतनी दमदार थी कि उसे ढूंढने के लिए किसी को स्टूडियो नहीं, बस एक पान की दुकान तक जाना पड़ा।

लाहौर, आज़ादी से पहले का दौर। एक उन्नीस-बीस साल का नौजवान, शहर की एक बड़ी फ़ोटोग्राफ़ी शॉप का इंचार्ज, हर शाम अपने तांगे पर सवार होकर सैर पर निकलता था। उसकी शख़्सियत इतनी असरदार थी कि आस-पास के बच्चे उसे देखकर तारीफ़ों के पुल बांध देते थे, और वो मुड़कर देखता भी नहीं था। यही थे प्राण साहब — इससे पहले कि वो फ़िल्मों के सबसे यादगार "विलेन" बनें, इससे पहले कि अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार के सामने "शेर ख़ान" बनकर खड़े हों, वो बस एक स्टाइलिश, ख़ूबसूरत नौजवान थे, जिसकी क़िस्मत एक पान की दुकान पर तय हुई। 12 जुलाई, 2013 को, 93 साल की उम्र में, मुंबई में प्राण साहब का निधन हो गया था। आइए आज उन्हें याद करते हुए, उनकी पूरी ज़िंदगी को क़रीब से देखें — दिल्ली में जन्म से लेकर लाहौर की रंगीन शामों तक, और फिर बॉम्बे के उस लंबे, शानदार सफ़र तक जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे सम्मानित "जेंटलमैन विलेन" बना दिया।

दिल्ली में जन्म, लाहौर में परवरिश की छाप

प्राण साहब का पूरा नाम था प्राण कृष्ण सिकंद, और उनका जन्म 12 फ़रवरी, 1920 को, दिल्ली के बल्लीमारान इलाक़े में हुआ था। उनके पिता, लाला केवल कृष्ण सिकंद, सरकार के लिए सड़कें और पुल बनवाने वाले एक कामयाब सिविल कॉन्ट्रैक्टर थे — देहरादून का मशहूर कालसी पुल भी उनके ही प्रोजेक्ट्स में से एक था। पिता की ट्रांसफ़रेबल नौकरी की वजह से प्राण साहब की पढ़ाई कई शहरों में हुई — कपूरथला, उन्नाव, मेरठ, देहरादून, रामपुर, और लाहौर भी। यानी बचपन से ही उन्हें कई शहरों की हवा लगी, कई तरह के लोगों के बीच रहना सीखा — और यही तजुर्बा शायद आगे चलकर उनके किरदारों की विविधता में झलकता रहा।

शुरुआत में प्राण साहब का सपना एक्टर बनना नहीं, बल्कि एक पेशेवर फ़ोटोग्राफ़र बनना था। उन्होंने ए. दास एंड कंपनी में अप्रेंटिस के तौर पर काम शुरू किया, और इसी सिलसिले में शिमला और फिर लाहौर पहुंचे। लाहौर में वो एक बड़ी फ़ोटोग्राफ़ी शॉप के इंचार्ज बन गए — एक ठीक-ठाक, इज़्ज़तदार नौकरी, जिसमें फ़िल्मों का कोई नामोनिशान नहीं था। पर उनकी शख़्सियत इतनी दमदार थी कि क़िस्मत ने कुछ और ही लिख रखा था।

पान की दुकान पर तय हुई क़िस्मत

बात है 1940 के आस-पास की। लाहौर की एक पान की दुकान पर लेखक वली मोहम्मद वली की नज़र प्राण साहब पर पड़ी। उन्हें प्राण साहब की शख़्सियत इतनी आकर्षक लगी कि उन्होंने फ़ौरन उन्हें अपनी अगली फ़िल्म में काम करने का ऑफ़र दे दिया। शुरुआत में प्राण साहब ने ना-नुकुर की — आख़िर वो एक ठीक-ठाक नौकरी छोड़कर एक अनजाने पेशे में क़दम रखने को तैयार नहीं थे। पर आख़िरकार वो मान गए, और इस तरह उनकी फ़िल्मी पारी की शुरुआत हुई पंजाबी फ़िल्म "यमला जट" (1940) से, जिसमें उन्होंने एक जुआरी का किरदार निभाया था — दिलचस्प बात ये है कि उनका ये पहला ही किरदार एक नकारात्मक किरदार था, यानी विलेन बनने का सफ़र उनकी शुरुआत से ही जुड़ गया था, भले ही आगे चलकर उन्होंने कुछ सालों तक हीरो के किरदार भी निभाए।

लाहौर में उसी दौर में एक्ट्रेस कामिनी कौशल जी भी रहा करती थीं। बरसों बाद, प्राण साहब के उन दिनों को याद करते हुए कामिनी जी ने कहा था कि प्राण साहब की एक अलग ही स्टाइल हुआ करती थी, और वो स्टाइल उस ज़माने में लाहौर में चर्चा का विषय बनी रहती थी — ये उस दौर की बात है जब प्राण साहब एक्टर बन चुके थे और मशहूर भी हो गए थे। प्राण साहब के गहरे दोस्त रहे मशहूर उर्दू अफ़साना-निगार सआदत हसन मंटो ने भी उस ज़माने को याद करते हुए एक बार कहा था — "प्राण बहुत सजीले थे। कपड़े बहुत सलीक़ेदार पहनते थे। लाहौर में प्राण बड़े मशहूर थे तब। उनके पास अपना ख़ुद का एक शानदार तांगा था। वो रोज़ शाम को अपने तांगे पर सवार होकर सैर करने निकलते थे।"

प्राण साहब के घनिष्ठ मित्र रहे, और बाद में समधी बने सतीश भल्ला जी ने एक इंटरव्यू में उस दौर को कुछ यूं याद किया था — "मैं तब 12 या 13 साल का था। प्राण हमारे लिए हीरो थे। बच्चे उनके फ़ैन थे। जब भी प्राण अपना तांगा लेकर हमारे नज़दीक से गुज़रते थे तो हम उनकी बहुत तारीफ़ें करते थे। लेकिन वो हमारी तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं देते थे।" ये बताता है कि प्राण साहब की मशहूरियत सिर्फ़ फ़िल्म इंडस्ट्री के भीतर नहीं थी — लाहौर की गलियों में, आम लोगों के बीच भी, वो एक हीरो की तरह देखे जाते थे, और वो भी उस उम्र में जब उन्होंने अभी सिनेमा में अपनी पहचान बनानी शुरू ही की थी।

अमेरिकन स्टाइल के कपड़े, कमानीदार मूछें — वो लुक जो हर किसी को याद रह गया

प्राण साहब की पर्सनैलिटी में वो हर ख़ासियत थी जो एक हीरो में होनी चाहिए। वो बेहतरीन से बेहतरीन कपड़े पहनते थे — टाइट सूट, रेशमी टाई, रेशमी रूमाल, ये उनका ख़ास अंदाज़ था। साथ में बढ़िया मैंटेन की हुई कमानीदार मूछें, जो आगे चलकर उनकी पहचान का एक हिस्सा बन गईं। ख़ुद प्राण साहब ने एक बार कहा था कि उन्हें अमेरिकन स्टाइल के कपड़े पहनना बेहद पसंद था। खेलों में भी उनकी दिलचस्पी रही। और बता दें, कुत्तों से भी उन्हें बचपन से ही ख़ास लगाव था — ज़िंदगी भर उनके पास हमेशा कोई न कोई पालतू कुत्ता रहा।

लाहौर के अपने दिनों को याद करते हुए प्राण साहब अक्सर कहते थे कि वहां की ज़िंदगी बड़ी मस्ती भरी थी, किसी तरह की कोई फ़िक्र नहीं थी। उस ज़माने में लाहौर फ़िल्म मेकिंग के मामले में भारत का सबसे डेवलप्ड शहर हुआ करता था, और फ़ैशन के मामले में भी उसका अलग ही रुतबा था — वहां के मर्द दुनिया भर के फ़ैशन ट्रेंड्स के हिसाब से रहते थे। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बार हुआ करते थे, और लाहौर की रेलवे कैंटीन में तो आधी रात के बाद भी लुत्फ़ उठाया जा सकता था। हीरामंडी इलाक़ा उस दौर में मनोरंजन और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र था, जहां शहर के ज़्यादातर मर्द ख़ूबसूरत लड़कियों का नाच-गाना देखने-सुनने जाया करते थे — प्राण साहब भी वहां जाया करते थे। यानी आज़ादी से पहले का लाहौर, जैसा प्राण साहब बताते थे, एक बेहद रंगीन शहर था, और प्राण साहब उस रंगीनियत का एक जीता-जागता हिस्सा थे।

बंटवारा, और वो सफ़र जो सब कुछ बदल गया

1947 का बंटवारा प्राण साहब के लिए भी वैसा ही झटका लेकर आया जैसा उस दौर के लाखों लोगों के लिए आया था। उस वक़्त तक वो लाहौर में नूरजहां जी की फ़िल्म "ख़ानदान" (1942) में हीरो बनकर और 22 फ़िल्मों में विलेन के किरदार निभाकर एक जमी-जमाई पहचान बना चुके थे। पर बंटवारे ने सब कुछ पीछे छुड़वा दिया। भारत की आज़ादी से बस एक दिन पहले, प्राण साहब अपनी पत्नी और एक साल के बेटे के साथ इंदौर पहुंचे — और उन्हें इस बात का गहरा मलाल था कि वो अब वापस लाहौर नहीं जा सकते। यहीं से वो आख़िरकार बॉम्बे पहुंचे। शुरुआती कुछ महीने संघर्ष में गुज़रे, पर आठ महीनों के भीतर ही उन्हें देव आनंद और कामिनी कौशल अभिनीत फ़िल्म "ज़िद्दी" (1948) में काम मिल गया — और यहीं से शुरू हुआ बॉम्बे में उनका दूसरा, और कहीं ज़्यादा बड़ा फ़िल्मी सफ़र।

वो विलेन जिससे नफ़रत भी होती थी, प्यार भी

बॉम्बे पहुंचने के बाद प्राण साहब ने छह दशकों से ज़्यादा लंबे करियर में 350 से 400 फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने "आफ़साना" (1951), "आज़ाद" (1955), "देवदास" (1955), "चोरी चोरी" (1956), "तुमसा नहीं देखा" (1957), "मधुमती" (1958), "जिस देश में गंगा बहती है" (1960) — राज कपूर की फ़िल्म, जिसमें उन्होंने एक डाकू का किरदार निभाया — "दिल दिया दर्द लिया" (1966), "राम और श्याम" (1967) जैसी फ़िल्मों में अपनी छाप छोड़ी। "राम और श्याम" में उनके विलेन किरदार को देखकर दर्शक सचमुच डर जाते थे और उनसे नफ़रत करने लगते थे — और उसी दर्शक वर्ग ने उन्हें "उपकार" (1967) में "मंगल चाचा" के भले किरदार में उतना ही प्यार भी दिया। यही तो प्राण साहब की सबसे बड़ी ख़ासियत थी — वो सिर्फ़ एक ढांचे में क़ैद नहीं थे, वो नफ़रत और मोहब्बत, दोनों जगा सकते थे, और अक्सर एक ही करियर के अलग-अलग मोड़ पर।

1973 में आई "ज़ंजीर" में प्राण साहब ने "शेर ख़ान" का किरदार निभाया, अमिताभ बच्चन के साथ — और यहां एक दिलचस्प बात ये है कि अमिताभ बच्चन का क़द छह फ़ुट दो इंच का था, जबकि प्राण साहब का क़द औसत था, फिर भी पर्दे पर वो उतने ही दमदार नज़र आए, बराबरी की टक्कर देते हुए। फ़िल्म के डायरेक्टर प्रकाश मेहरा ने ख़ुद कहा था कि अगर प्राण साहब ने ये फ़िल्म साइन न की होती, तो शायद "ज़ंजीर" बन ही न पाती। और यहां प्राण साहब के उसूलों की भी एक मिसाल है — उन्होंने अपने दोस्त मनोज कुमार की फ़िल्म "शोर" ठुकरा दी थी, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसमें भी एक पठान का किरदार था, और वो पहले से ही "ज़ंजीर" में पठान का किरदार निभा रहे थे। एक अभिनेता का इस हद तक अपने किरदारों को लेकर सोचना, उस दौर में बहुत कम देखने को मिलता था।

"जॉनी मेरा नाम" (1970), "बेईमान" (1972), "बॉबी" (1973), "डॉन" (1978), "कर्ज़" (1980), "नसीब" (1981) — ये फ़ेहरिस्त बताती है कि प्राण साहब सत्तर और अस्सी के दशक में हिंदी सिनेमा की लगभग हर बड़ी फ़िल्म का हिस्सा रहे। फ़िल्मों के क्रेडिट्स में उनका नाम अक्सर बाक़ी कलाकारों से अलग, स्वतंत्र तौर पर "एंड प्राण" लिखकर दिखाया जाता था — ये अपने आप में इस बात का सबूत था कि वो किसी आम सह-कलाकार से कहीं बढ़कर थे। यही वजह है कि उनकी जीवनी का शीर्षक भी "एंड प्राण" रखा गया।

सम्मान जो देर से मिले, पर पूरे दिल से मिले

2000 में स्टारडस्ट मैगज़ीन ने उन्हें "विलेन ऑफ़ द मिलेनियम" का ख़िताब दिया। 2001 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। और आख़िरकार, अप्रैल 2013 में, यानी उनके निधन से बस कुछ महीने पहले, उन्हें भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान — दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड — दिया गया। ये सम्मान बरसों पहले मिल जाना चाहिए था, ऐसा मानने वालों की भी इंडस्ट्री में कमी नहीं रही, पर देर से ही सही, प्राण साहब को उनके योगदान का पूरा सम्मान मिला, और ये देखकर उनके चाहने वालों को सुकून ज़रूर मिला होगा।

घर की दुनिया, और वो आख़िरी दिन

प्राण साहब की शादी शुक्ला जी से 1945 में हुई थी, और ये साथ उनके निधन तक, यानी लगभग 68 साल तक क़ायम रहा। उनके दो बेटे हुए — अरविंद और सुनील — और एक बेटी, पिंकी। लंबी बीमारी के बाद, 12 जुलाई, 2013 को, मुंबई के लीलावती अस्पताल में, 93 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। वो क़रीब एक महीने से निमोनिया का इलाज करा रहे थे, और आख़िरी कुछ दिनों से वेंटिलेटर पर थे। उनका अंतिम संस्कार शिवाजी पार्क में हुआ।

आज, जब हम प्राण साहब को याद करते हैं, तो सिर्फ़ उनके विलेन वाले किरदार याद नहीं आते — याद आता है वो नौजवान भी जो लाहौर की सड़कों पर अपने तांगे पर सवार होकर सैर करता था, जिसकी स्टाइल पूरे शहर में चर्चा का विषय बनी रहती थी, और जिसने बंटवारे में सब कुछ पीछे छोड़ने के बावजूद एक नई ज़मीन पर, नए सिरे से, इतना बड़ा मुक़ाम हासिल किया। यही असली हुनर था प्राण साहब का — हर हाल में, हर किरदार में, अपनी अलग पहचान बनाए रखना।

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