बाहुबली की वो कहानी जो एक ख्वाब से शुरू हुई थी, और इतिहास बनकर खत्म हुई?
एक फ़िल्म, जिसकी जड़ें एक पिता की सुनाई कहानी में थीं, और जिसने पूरे भारतीय सिनेमा का चेहरा बदल दिया।
Mehboob Studio जैसी किसी भी जगह की चमक-दमक नहीं थी उस कमरे में, जहाँ एक बूढ़ा लेखक अपने बेटे को एक किरदार सुना रहा था। कोई कैमरा नहीं, कोई स्पॉटलाइट नहीं। बस एक बाप, एक बेटा, और एक औरत का किरदार जो अपनी जान देकर एक बच्चे को बचाती है। वो बेटा बाद में एस.एस.राजामौली कहलाया। और वो किरदार बना शिवगामी देवी — जिसने आगे चलकर भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी क्रांति की नींव रखी। १० जुलाई, २०१५ — याद है ये तारीख़? शायद अब धुंधली पड़ गई हो, पर उस दिन जो हुआ, उसने बॉक्स ऑफ़िस का पूरा गणित ही बदल डाला। बाहुबली: द बिगनिंग रिलीज़ हुई, और उसके साथ ही "पैन इंडिया" नाम का एक शब्द हिंदी सिनेमा की डिक्शनरी में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
जब एक सवाल पूरे देश की ज़ुबान पर चढ़ गया
कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? — इस एक लाइन ने वो कर दिखाया जो शायद ही किसी मार्केटिंग टीम की स्ट्रेटेजी कर पाती। ये सवाल चाय की दुकानों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक गूंजा। लोग इसे मीम बना रहे थे, कॉमेडी शो में इस पर स्केच बन रहे थे, और सबसे बड़ी बात — जो आदमी कभी तेलुगु सिनेमा नहीं देखता था, वो भी इस फ़िल्म को समझने के लिए थिएटर तक पहुंच रहा था। दुनियाभर में इस फ़िल्म ने कुल मिलाकर करीब 650 करोड़ रुपए का ग्रॉस कलेक्शन किया, जबकी फ़िल्म का बजट लगभग 180 करोड़ रुपए के आसपास था। ये आंकड़े आज भी उस दौर के हिसाब से हैरतअंगेज़ माने जाते हैं। सोचिए — 2015 में, जब हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री अभी भी दक्षिण की फ़िल्मों को "छोटे बजट का सिनेमा" समझती थी, तब एक तेलुगु फ़िल्म ने वो कर दिखाया जो बड़े-बड़े हिंदी प्रोड्यूसर सपने में भी नहीं सोच पाते थे।
कहा जाता है कि जब बाहुबली की स्क्रिप्ट पहली बार प्रोड्यूसर्स के सामने पढ़ी गई थी, तो कमरे में सन्नाटा छा गया था — किसी को समझ ही नहीं आया कि इतनी बड़ी दुनिया, इतने किरदार, इतना विशाल कैनवस आखिर पर्दे पर कैसे उतरेगा। एक वक्त ऐसा भी आया था जब बजट को लेकर टीम के अंदर ही असहमति की खबरें उड़ीं, पर राजामौली अपनी ज़िद पर अड़े रहे। यही ज़िद आगे चलकर इतिहास बन गई, ऐसा उस दौर के करीबी लोग बताते हैं।
पिता की कलम, बेटे का कैमरा
बाहुबली की कहानी लिखी थी वी. विजयेंद्र प्रसाद ने, जो खुद राजामौली के पिता हैं। जब फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, तब फ़ोर्ब्स मैगज़ीन ने उनका एक इंटरव्यू लिया था, और उस बातचीत में जो बातें सामने आईं, वो किसी भी सिनेमा प्रेमी के लिए दिलचस्पी से भरी थीं। विजयेंद्र प्रसाद जी ने बताया था कि इस पूरी महागाथा की प्रेरणा उन्हें सबसे पहले शिवगामी देवी के किरदार से मिली — यानी कहानी की शुरुआत किसी हीरो से नहीं, बल्कि एक स्त्री के त्याग से हुई थी। (ज़रा सोचिए, कितनी अलग बात है ये — आमतौर पर ऐसी भव्य फ़िल्मों की जड़ में हीरो का किरदार होता है, यहां शुरुआत एक मां के बलिदान से हुई।) शिवगामी के बाद धीरे-धीरे बाहुबली, भल्लालदेव और कटप्पा जैसे किरदार आकार लेते गए, और एक-एक करके एक पूरी दुनिया बुन दी गई।
राजामौली खुद कई बार बता चुके हैं कि जब उनके पिता ने पहली बार उन्हें शिवगामी देवी वाला सीन सुनाया था — जिसमें वो एक बच्चे की जान बचाते हुए खुद मर जाती है — उस वक्त तक कोई कहानी नहीं बनी थी। बस एक किरदार था, एक भावना थी। साल बीतते गए, और फिर एक दिन पिता ने बेटे को एक वफ़ादार गुलाम का किरदार सुनाया — वही किरदार आगे चलकर कटप्पा कहलाया। उसके कुछ अरसे बाद भल्लालदेव भी कागज़ पर उतरा। और मज़े की बात ये है कि उस वक्त तक राजामौली को खुद अंदाज़ा नहीं था कि ये तीनों किरदार कभी एक ही फ़िल्म में साथ आएंगे। डैस्टिनी, जैसा कि कहते हैं, अपना रास्ता खुद बनाती है।
श्रीदेवी से राम्या कृष्णन तक — शिवगामी का सफ़र
ये किस्सा अब फ़िल्मी हलकों में लगभग हर कोई जानता है, पर हर बार सुनने पर दिल थोड़ा कसकता है। कहा जाता है कि राजमाता शिवगामी देवी के किरदार के लिए राजामौली की पहली पसंद लेट श्रीदेवी जी थीं। सोचिए ज़रा — अगर श्रीदेवी उस किरदार में होतीं, तो फ़िल्म का रंग-ढंग शायद कुछ और ही होता। मगर बताया जाता है कि फ़ीस को लेकर बात फ़िल्म के बजट के दायरे से बाहर चली गई, और आखिरकार ये भूमिका राम्या कृष्णन के हिस्से आई। और यहां ये कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि राम्या जी ने इस किरदार को इतनी शिद्दत से निभाया कि आज शिवगामी देवी का नाम सुनते ही उनका ही चेहरा ज़हन में उभरता है — मानो ये किरदार कभी किसी और के लिए लिखा ही नहीं गया था।
लेकिन बाहुबली के किरदार को लेकर राजामौली के मन में कभी कोई दुविधा नहीं रही। प्रभास उनकी पहली और आख़िरी चॉइस थे — शुरू से आख़िर तक। जब पिता ने पहली बार बाहुबली का किरदार सुनाया था, राजामौली के ज़हन में उसी वक्त प्रभास का चेहरा उभर आया था। प्रभास की शारीरिक बनावट, उनका कद-काठी, उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस — यही सब कुछ राजामौली को लगा कि यही वो शख्स है जो इस महाकाव्य के केंद्र में खड़ा हो सकता है। और नतीजा सबके सामने है।
खैर, यह तो सबको पता है कि फ़िल्म रिलीज़ के बाद प्रभास रातों-रात पैन इंडिया स्टार बन गए। पर उस मुकाम तक पहुंचने से पहले का सफ़र इतना आसान नहीं था। शूटिंग सालों चली, महल जैसे विशाल सेट रामोजी फ़िल्म सिटी में बनाए गए, और VFX पर इतना काम हुआ कि उस दौर में भारत में इतने बड़े स्तर पर विज़ुअल इफ़ेक्ट्स पर काम करने की मिसाल कम ही मिलती थी।
उस दौर में चर्चा यही थी कि सेट पर काम इतना भव्य और मेहनत-तलब था कि टीम के कई सदस्य महीनों घर नहीं गए। कहा जाता है कि खुद राजामौली शूट के दिनों में सेट पर ही घंटों बैठकर हर एक फ्रेम को बारीकी से परखते थे, चाहे वो एक रथ का पहिया हो या किसी योद्धा की तलवार की चमक। सूत्र बताते हैं कि इतनी बारीकी की वजह से ही फ़िल्म का बजट बार-बार बढ़ता गया।
वो सवाल, जिसने पूरे देश को इंतज़ार में रखा
"कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?" — ये सिर्फ़ एक डायलॉग नहीं था, ये एक कल्चरल फ़िनॉमिनन बन गया। दो साल तक, यानी जब तक बाहुबली: द कन्क्लूज़न रिलीज़ नहीं हुई, ये सवाल हर जगह घूमता रहा। शादियों में, दफ़्तरों में, यहां तक कि क्रिकेट कमेंट्री में भी इस लाइन का ज़िक्र हो जाता था। और जब आखिरकार जवाब आया, तो दूसरा भाग पहले से भी बड़ा धमाका साबित हुआ। ये अपने आप में एक मिसाल है कि कैसे एक सही सवाल, सही वक्त पर पूछा जाए, तो वो किसी भी बड़े प्रमोशन कैंपेन से ज़्यादा असरदार हो सकता है।
क्या ये सब महज़ इत्तेफ़ाक था? या फिर एक बाप-बेटे की जोड़ी ने सालों की मेहनत से इसे इतनी सफ़ाई से गढ़ा था कि हर टुकड़ा अपनी जगह फ़िट बैठे? शायद दोनों बातें सच हैं।
बाहुबली ने सिर्फ़ बॉक्स ऑफ़िस के आंकड़े नहीं बदले, इसने हिंदी सिनेमा और दक्षिण सिनेमा के बीच की वो दीवार भी गिरा दी जो दशकों से खड़ी थी। इसके बाद के सालों में जितनी भी पैन इंडिया फ़िल्में बनीं — चाहे वो KGF हो, पुष्पा हो, या RRR — हर एक का रास्ता कहीं न कहीं बाहुबली ने ही तैयार किया था। यही वजह है कि फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग आज भी इसे एक 'गेम चेंजर' कहते हैं, न कि सिर्फ़ एक हिट फ़िल्म।
दस साल बीत चुके हैं, फिर भी जब कभी महिष्मति राज्य के उस भव्य दरबार का दृश्य टीवी पर आता है, लोग चैनल नहीं बदलते। यही किसी भी फ़िल्म की असली कामयाबी है — कि वो सिर्फ़ रिलीज़ के हफ़्ते तक सीमित न रहे, बल्कि सालों बाद भी उतनी ही ताज़ा लगे।