तेज़ाब की सफलता के बाद अनिल कपूर को किस बात पर गुस्सा आ गया था?
एक सुपरस्टार, जिसे यक़ीन था कि अगली बड़ी फ़िल्म भी उसी की होगी — और एक डायरेक्टर, जिसने सीधे मना कर दिया।
1988 में तेज़ाब जैसी बड़ी हिट देने के बाद अनिल कपूर के हौसले बुलंद थे। एन. चंद्रा के साथ उनकी जोड़ी कमाल की चल रही थी, और अनिल कपूर को पूरा यक़ीन था कि डायरेक्टर की अगली बड़ी फ़िल्म में भी हीरो वही होंगे। मगर जब पता चला कि एन. चंद्रा अपनी अगली फ़िल्म नरसिम्हा में सनी देओल को लीड रोल दे रहे हैं, अनिल कपूर को ये बात हज़म नहीं हुई। उन्होंने खुलकर अपनी नाराज़गी एन. चंद्रा तक पहुंचाई — सवाल एक ही था, आख़िर सनी देओल को क्यों लिया गया, उन्हें क्यों नहीं? एन. चंद्रा ने इसका जवाब बड़े सीधे अंदाज़ में दिया। उनका कहना था कि नरसिम्हा जैसा किरदार, जिसकी शारीरिक बनावट और गुस्से का जो रूप स्क्रिप्ट में लिखा गया था, उसमें सनी देओल ही सटीक बैठते हैं। सिर्फ़ ज़बानी समझाने से बात नहीं बनी, तो एन. चंद्रा ने अनिल कपूर को फ़िल्म के रशेज़ यानी शुरुआती शूट किए हुए फुटेज दिखाए। और तब जाकर अनिल कपूर को ख़ुद एहसास हुआ कि डायरेक्टर सही कह रहे थे — नरसिम्हा के किरदार में वो उतना नहीं जमते, जितना सनी देओल जम रहे थे। ये वाक़या अपने आप में बॉलीवुड की उस पुरानी सच्चाई को उजागर करता है — कि एक हिट फ़िल्म के बाद हर हीरो को लगता है कि अगली फ़िल्म भी उसी की मुट्ठी में है, लेकिन डायरेक्टर की नज़र में किरदार और कलाकार का मेल हमेशा पहली प्राथमिकता होता है, स्टारडम नहीं।
हीरोइन की कुर्सी के लिए जो हंगामा मचा, वो कम दिलचस्प नहीं
अब बात करते हैं फ़िल्म की हीरोइन की, क्योंकि इस रोल की कहानी किसी थ्रिलर से कम नहीं। नरसिम्हा से उर्मिला मातोंडकर का बतौर लीडिंग लेडी डेब्यू हुआ था। इससे पहले उर्मिला बाल कलाकार के तौर पर कुछ फ़िल्मों में काम कर चुकी थीं — जिनमें कल्युग भी शामिल थी। लेकिन हीरोइन के तौर पर ये उनकी पहली फ़िल्म थी, और आगे चलकर उर्मिला ने बॉलीवुड की सबसे कामयाब अभिनेत्रियों में अपनी जगह बना ली। मगर उर्मिला तक पहुंचने से पहले ये रोल कई हाथों से होकर गुज़रा। सबसे पहले ममता कुलकर्णी को इस किरदार के लिए संपर्क किया गया था, लेकिन उस वक़्त ममता किसी और प्रोड्यूसर के साथ पहले ही कॉन्ट्रैक्ट साइन कर चुकी थीं, इसलिए वो ये फ़िल्म नहीं कर पाईं। इसके बाद ये रोल आयशा झुल्का को मिला, और असल में ये फ़िल्म आयशा झुल्का की भी डेब्यू फ़िल्म बनने वाली थी। लेकिन IMDb पर दर्ज ट्रिविया के मुताबिक़, फ़िल्म के प्रोड्यूसर कुमार मंगत के साथ आयशा झुल्का का बर्ताव अच्छा नहीं रहा, और नतीजा ये हुआ कि उन्हें बिना पहले से बताए फ़िल्म से हटा दिया गया।
आयशा झुल्का के जाने के बाद राजेश्वरी सचदेव को साइन किया गया, और उन्होंने कुछ दिनों की शूटिंग भी पूरी कर ली थी। मगर तभी एक हादसा हो गया — उनके पैर में गंभीर चोट लग गई, जिसकी वजह से आगे शूटिंग करना उनके लिए मुमकिन ही नहीं रहा। पैर ठीक होने में इतना वक़्त लगने वाला था कि एन. चंद्रा के लिए इंतज़ार करना घाटे का सौदा बन जाता, इसलिए उन्हें फ़िल्म से अलग होना पड़ा।
राजेश्वरी सचदेव के हटने के बाद एन. चंद्रा ने एक्ट्रेस प्राजक्ता कुलकर्णी को ये रोल ऑफ़र किया। मगर प्राजक्ता ने वो प्रस्ताव ठुकरा दिया, क्योंकि उन दिनों वो ख़ुद एक मराठी फ़िल्म से डेब्यू करने वाली थीं, और अपना पूरा ध्यान उसी पर केंद्रित रखना चाहती थीं। यही प्राजक्ता कुलकर्णी बाद में दामिनी फ़िल्म में भी नज़र आईं, जहां उन्होंने ऋषि कपूर के घर की उस नौकरानी का किरदार निभाया, जिसके साथ होली के दिन एक बेहद संवेदनशील और चर्चित सीन फ़िल्माया गया था। यानी सोचकर देखिए — ममता कुलकर्णी, आयशा झुल्का, राजेश्वरी सचदेव, प्राजक्ता कुलकर्णी — चार अलग-अलग अभिनेत्रियां इस एक किरदार से जुड़ीं और अलग-अलग वजहों से निकलती चली गईं, तब जाकर आख़िर में ये रोल उर्मिला मातोंडकर तक पहुंचा। कास्टिंग की दुनिया में ऐसा उलटफेर कोई असाधारण बात नहीं, लेकिन जब एक के बाद एक चार बदलाव हों, तो ये ज़रूर सोचने पर मजबूर करता है कि क़िस्मत किस मोड़ पर किसे कहां ले जाती है।
एक डेब्यू और भी, जिसे अक्सर भुला दिया जाता है
नरसिम्हा में उर्मिला मातोंडकर के अपोज़िट रवि बहल नज़र आए थे, और दिलचस्प बात ये है कि ये फ़िल्म रवि बहल की भी डेब्यू फ़िल्म थी। यानी एक ही फ़िल्म ने दो नए चेहरों को इंडस्ट्री से परिचित कराया — हालांकि आगे चलकर दोनों के करियर बिल्कुल अलग दिशाओं में गए। उर्मिला मातोंडकर ने आने वाले सालों में रंगीला, जुदाई और भूत जैसी फ़िल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई, जबकि रवि बहल का नाम बाद में टेलीविज़न होस्टिंग और चंद फ़िल्मों तक ही सीमित रहा। फ़िल्म 5 जुलाई 1991 को रिलीज़ हुई थी, और एन. चंद्रा के करियर की ये लगातार चौथी हिट फ़िल्म साबित हुई — अंकुश, प्रतिघात और तेज़ाब के बाद। सनी देओल और दिम्पल कपाड़िया मुख्य भूमिका में थे, संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का था और गीत जावेद अख़्तर ने लिखे थे। एक ऐसी फ़िल्म, जिसकी कास्टिंग की कहानी ख़ुद फ़िल्म जितनी ही उतार-चढ़ाव से भरी रही — शायद यही वजह है कि तीस से ज़्यादा साल बीत जाने के बाद भी, इस फ़िल्म के पर्दे के पीछे के ये किस्से आज भी बॉलीवुड की महफ़िलों में सुनाए जाते हैं।