वो प्रीमियर, वो हाथ में हाथ, और संजीव कुमार का टूटा दिल — हेमा मालिनी की वो प्रेम कहानी जो अधूरी रह गई?
एक शाम, जिसने दो दिलों के बीच की दूरी को हमेशा के लिए इतना बढ़ा दिया कि फिर कभी वो पास नहीं आ सके।
स्टर्लिंग सिनेमा के उस ऑडिटोरियम में उस रात एक अजीब सी सरगोशी फैल गई थी। संजीव कुमार स्टेज पर अपनी तय सीट पर बैठे थे, इंतज़ार में, कि प्रीमियर शुरू हो। और तभी लोगों की आवाज़ें दबी-दबी सी बढ़ने लगीं, सबकी नज़रें ऑडिटोरियम के दरवाज़े की तरफ़ घूम गईं। संजीव कुमार ने भी पलटकर देखा — और वहां जो नज़ारा था, उसने उन्हें अंदर तक हिला दिया। राजेश खन्ना, हेमा मालिनी का हाथ थामे, इत्मीनान से चले आ रहे थे। दोनों आकर पहली रो में बैठ गए। स्टेज पर बैठे संजीव कुमार का चेहरा उस पल जिस तरह का रहा होगा, उसे बयां करना शायद मुश्किल है।
जब एक शादी की जुगलबंदी में जन्मी एक और प्रेम कहानी
पर इस कहानी की शुरुआत उस अपमान से बहुत पहले हुई थी — महाबलेश्वर की उन वादियों में, जहां "सीता और गीता" के गाने "हवा के साथ साथ" की शूटिंग चल रही थी। रमेश सिप्पी ने जब हेमा मालिनी को इस फ़िल्म का ऑफ़र दिया था, तो हेमा जी थोड़ी सकुचाई थीं — उन्हें लग रहा था कि दिलीप कुमार के लैजेंडरी "राम और श्याम" जैसे डबल-रोल किरदार के मुकाबले भला वो कहां टिक पाएंगी। रमेश सिप्पी ने उन्हें समझाया कि ऑडियंस ऐसी कोई तुलना नहीं करेगी, और हेमा जी राज़ी हो गईं। फ़िल्म में हीरो के तौर पर धर्मेंद्र और संजीव कुमार को साइन किया गया — हालांकि ये फ़िल्म पूरी तरह हीरोइन-ओरिएंटेड थी, और शुरुआत में रमेश सिप्पी को शक था कि दोनों बड़े स्टार इतनी छोटी भूमिकाओं के लिए राज़ी होंगे भी या नहीं। मगर जो सीन थे, वो दमदार थे, और दोनों ने हामी भर दी।
स्केटिंग वाले उस गाने में हेमा जी और संजीव कुमार, दोनों ही स्केटिंग में एकदम अनाड़ी निकले। शूट के दौरान बार-बार दोनों गिरते, और हर बार सेट पर मौजूद लोग हंसी नहीं रोक पाते। आखिरकार रमेश सिप्पी ने बड़ी चालाकी से इसी अनाड़ीपन को गाने का हिस्सा बना लिया। मगर इसी शूट के दौरान एक हादसा भी हो गया — जिस ट्रॉली पर दोनों बैठे थे, वो अचानक पलट गई। पास ही एक गहरी खाई थी, और अगर किस्मत ने साथ न दिया होता तो नतीजा भयानक हो सकता था। पर दोनों खाई में नहीं, बल्कि बगल में मौजूद झाड़ियों पर जा गिरे — छोटी-मोटी खरोंचों के अलावा कुछ नहीं हुआ। (सोचिए ज़रा, कैसे एक हादसा, जो जानलेवा हो सकता था, दो लोगों को इतना करीब ले आया कि उनकी ज़िंदगी की दिशा ही बदल गई।) उस डर और उस राहत के मिले-जुले एहसास ने ही शायद हेमा मालिनी और संजीव कुमार के दिलों में एक-दूसरे के लिए जगह बना दी।
शांताबेन का दिल जीतना — पर एक शर्त पर
संजीव कुमार एक बार फिर मोहब्बत में पड़ चुके थे, और इस बार वो शादी को लेकर बेहद गंभीर थे। मगर इतिहास खुद को दोहराने लगा — उनकी मां शांताबेन ने पहले भी कई एक्ट्रेसेज़ को बहू के तौर पर नकारा था, और इस बार भी उन्होंने आपत्ति जताई। शांताबेन नहीं चाहती थीं कि कोई हीरोइन उनके घर की बहू बने। हेमा जी को जब ये बात पता चली, तो उन्हें गहरा दुख हुआ — क्योंकि वो दोनों परिवारों की पूरी रज़ामंदी के बग़ैर इस रिश्ते के बारे में सोच भी नहीं सकती थीं। संजीव कुमार ने उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी मां आखिरकार मान जाएंगी।
और ऐसा हुआ भी। हेमा जी ने अपने व्यवहार से शांताबेन का दिल जीत लिया। जब भी वो उनसे मिलतीं, सिर को पल्लू से ढक लेतीं, बड़े सम्मान से पैर छूतीं। धीरे-धीरे वो जरीवाला परिवार का एक हिस्सा सी बनने लगीं। संजीव कुमार की बहन गायत्री पटेल जी ने बाद में बताया था कि हेमा जी शांताबेन का बहुत सम्मान करती थीं — विदेश यात्रा से लौटते वक्त उनके लिए तोहफ़े लातीं, और जब भी संजीव कुमार व शांताबेन मद्रास जाते, हेमा जी उनका पूरा ख्याल रखतीं। एक बार अपने जन्मदिन पर, मद्रास से ही हेमा जी ने संजीव कुमार के घर फ़ोन किया और शांताबेन से कहा — "माताजी, आज मेरा जन्मदिन है, आप मुझे आशीर्वाद दीजिए।" उस दिन दोनों ने फ़ोन पर काफ़ी देर बातचीत की थी।
हनीफ़ ज़वेरी व सुमंत बत्रा द्वारा लिखित "एन एक्टर्स एक्टर: एन ऑथोराइज़्ड बायोग्राफ़ी ऑफ़ संजीव कुमार" में दर्ज है कि संजीव कुमार भले ही कैमरे के सामने बेहद सहज और मुखर नज़र आते हों, असल ज़िंदगी में वो बिल्कुल उलट इंसान थे — शर्मीले, अजीब तरह से अंतर्मुखी, और अपनी भावनाओं को खुलकर ज़ाहिर न कर पाने वाले। किताब के मुताबिक़ उनकी शख्सियत का यही पहलू आगे चलकर हेमा जी से उनके अलगाव की एक बड़ी वजह बना।
करियर बनाम शादी — वो शर्त जो कोई मानने को तैयार नहीं था
सब कुछ ठीक चल ही रहा था कि एक बुनियादी सवाल दोनों परिवारों के बीच दीवार बनकर खड़ा हो गया। शांताबेन ही नहीं, खुद संजीव कुमार भी यही चाहते थे कि शादी के बाद हेमा जी फ़िल्मों में काम करना छोड़ दें। गायत्री पटेल जी के मुताबिक़, हेमा जी ने खुद संजीव कुमार से वादा भी किया था कि वो बस अपने मौजूदा प्रोजेक्ट्स पूरे करेंगी, और फिर फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह देंगी। मगर जब संजीव कुमार का परिवार हेमा जी का हाथ मांगने मद्रास पहुंचा — शांताबेन अपने साथ रिवाज़ के मुताबिक़ मिठाइयों के डिब्बे लेकर गईं, हेमा जी की मां जया चक्रवर्ती भी उनसे मिलकर बेहद खुश हुईं — तब हेमा जी की मां ने एक शर्त साफ़ शब्दों में रख दी: "शादी के बाद भी हेमा फ़िल्मों में काम करती रहेगी।"
बरसों बाद पत्रकार भावना सोमाया को दिए एक इंटरव्यू में हेमा मालिनी जी ने बताया था कि उनकी मां उन्हें वो सब कुछ देना चाहती थीं जो उन्हें खुद कभी नहीं मिला — और उन्हें एक कलाकार के रूप में गढ़ना उनकी मां के लिए किसी तपस्या से कम नहीं था। इसी वजह से जया चक्रवर्ती किसी भी सूरत में नहीं चाहती थीं कि शादी के बाद हेमा का करियर रुक जाए। जरीवाला परिवार के लिए ये शर्त मानना नामुमकिन था। दोनों तरफ़ से ज़िद बढ़ती गई — संजीव कुमार को उम्मीद थी कि हेमा अपनी मां को मना लेंगी, और हेमा को उम्मीद थी कि एक दिन संजीव खुद आकर कहेंगे कि उन्हें कोई एतराज़ नहीं। दोनों उम्मीदें कभी पूरी नहीं हुईं।
हेमा जी अपनी मां और संजीव कुमार, दोनों की ज़िदों के बीच पिसती रहीं। आखिरकार उन्होंने एक बीच का रास्ता सुझाया — फ़िलहाल उन्हें फ़िल्मों में काम करने दिया जाए, और जब सगाई की खबर इंडस्ट्री में फैलेगी तो प्रोड्यूसर्स खुद-ब-खुद उन्हें साइन करना बंद कर देंगे, और तब वो पूरी तरह घर संभाल लेंगी। मगर संजीव कुमार इस प्रस्ताव के लिए भी राज़ी नहीं हुए। रिश्ते में एक ठहराव सा आ गया था, और ठीक इसी नाज़ुक मोड़ पर राजेश खन्ना ने अपनी चाल चली।
वो रात, जिसने सबकुछ बदल दिया
राजेश खन्ना और संजीव कुमार के बीच उन दिनों गहरी प्रतिद्वंदिता चलती थी — इंडस्ट्री के अंदर ये बात किसी से छुपी नहीं थी। किसी तरह राजेश खन्ना को हेमा-संजीव के डांवाडोल रिश्ते की भनक लग गई। इंडियन नेशनल थिएटर (आईएनटी) के जनरल सेक्रेटरी दामू ज़वेरी ने स्टर्लिंग सिनेमा में एक हॉलीवुड फ़िल्म का प्रीमियर फंड-रेज़र के तौर पर आयोजित किया था। राजेश खन्ना और संजीव कुमार, दोनों को न्यौता भेजा गया — राजेश खन्ना से कहा गया कि वो शर्मिला टैगोर को साथ लाएं (जिनके साथ वो उन दिनों एक फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे), और संजीव कुमार से कहा गया कि वो हेमा जी को साथ लाएं।
राजेश खन्ना को पता था कि संजीव कुमार भी वहां होंगे। संजीव कुमार को ये अंदाज़ा तक नहीं था कि राजेश खन्ना भी उस शाम आने वाले हैं। और हेमा जी को तो राजेश खन्ना व संजीव कुमार की आपसी प्रतिद्वंदिता के बारे में कुछ पता ही नहीं था — वो तो बस राजेश खन्ना के कहने पर, उनके साथ इस प्रीमियर में शामिल होने चली आई थीं। जब वो हाथ में हाथ डाले ऑडिटोरियम में दाखिल हुए, तो हेमा जी को भी उतना ही झटका लगा जितना संजीव कुमार को — बस वजहें अलग थीं। संजीव कुमार को गहरा अपमान महसूस हुआ, हेमा जी को अचानक समझ आया कि ये सब जानबूझकर रचा गया एक खेल था। पर उस वक्त वो राजेश खन्ना से ये पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया।
संजीव कुमार स्टेज से उतरकर एक दूसरी रो में, हेमा और राजेश खन्ना से दूर जाकर बैठ गए। पूरे शो के दौरान तीनों में से किसी ने भी एक-दूसरे से बात नहीं की — वो सन्नाटा, वो अनकहापन, शायद उस रात की सबसे भारी चीज़ थी।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद दिल से टूटे संजीव कुमार ने अपने कुछ खास दोस्तों को पूरी बात बताई। दोस्तों ने उन्हें समझाया कि राजेश खन्ना ने ये सब जानबूझकर, उन्हें अपमानित करने की नीयत से किया है, और इसमें हेमा जी का कोई दोष नहीं। मगर वो चोट इतनी गहरी थी कि उसे समझाइशों से भरा नहीं जा सकता था। रातभर संजीव कुमार सो नहीं पाए — ऐसा उनके करीबी दोस्तों ने बाद में बताया।
अगली सुबह — कैमरे के सामने एक टूटा हुआ दिल
अगले दिन संजीव कुमार "अनामिका" फ़िल्म के गीत "बाहों में चले आओ" की शूटिंग के लिए एस.डी.बर्मन के बंगले पर पहुंचे। हीरोइन थीं जया भादुड़ी। हर शॉट उन्होंने बड़ी सफ़ाई से दिया, मगर हर शॉट के बाद उनके चेहरे पर एक डार्कनेस उतर आती — जिसे वो छुपाने की भरसक कोशिश कर रहे थे। जया जी ने ये नोटिस कर लिया कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने संजीव कुमार को हंसाने की कोशिश भी की, मगर नाकाम रहीं। आखिरकार लंच ब्रेक में संजीव कुमार ने उन्हें पूरी बात बता दी। जया जी को हैरानी इस बात की हुई कि इतना टूटा हुआ इंसान आखिर काम कैसे कर पा रहा है।
लंच के बाद जब शूटिंग फिर शुरू हुई, तो अब जया जी खुद उस बात से इतनी हिल गई थीं कि उनके लिए एक्टिंग करना मुश्किल हो गया। तब संजीव कुमार ने ही उन्हें समझाया — कि एक कलाकार की सबसे पहली ड्यूटी यही होती है कि उसे जो किरदार सौंपा गया है, वो उसे बेहतरीन तरीके से निभाए, क्योंकि दर्शकों को उसकी निजी ज़िंदगी से कोई सरोकार नहीं। जया भादुड़ी ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि उस दिन उन्होंने पहली बार देखा कि संजीव कुमार अपने काम को लेकर कितने डेडिकेटेड थे — चाहे अंदर से वो कितने भी टूटे हों।
उस प्रीमियर की घटना के बाद हेमा जी बार-बार संजीव कुमार के घर फ़ोन करती रहीं, पर वो उन्हें इग्नोर करते रहे। आखिरकार हेमा जी सीधे पेरिन विला पहुंच गईं। उस दिन दोनों के बीच राजेश खन्ना, करियर और शादी को लेकर लंबी बातचीत हुई। बातचीत के अंत में संजीव कुमार ने सीधा सवाल पूछ लिया — क्या हेमा शादी के बाद फ़िल्मों में काम करना बंद करेंगी? हेमा जी ने साफ़ कह दिया कि वो अपना करियर नहीं छोड़ सकतीं।
संजीव कुमार ने बस इतना कहा — "ठीक है, फिर तुम मुझे हमेशा के लिए छोड़ दो।" और वो कमरा छोड़कर चले गए। हेमा जी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतने सालों का रिश्ता इस तरह, इन चंद शब्दों में खत्म हो गया। वो कुछ देर वहीं स्तब्ध बैठी रहीं। और जब समझ आया कि अब कुछ बचा नहीं है, तब वो भी उठकर चली गईं। यूं एक ऐसी प्रेम कहानी का अंत हो गया, जिसकी शुरुआत एक हादसे से हुई थी, और अंत भी एक और की साज़िश ने कर दिया।
आज संजीव कुमार जी का जन्मदिन है। 9 जुलाई, 1938 को आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था। दशकों बाद भी उनकी और हेमा मालिनी की ये अधूरी प्रेम कहानी फ़िल्म इंडस्ट्री के सबसे भावुक और सबसे कम बताए गए किस्सों में गिनी जाती है — एक ऐसी कहानी जिसमें कोई खलनायक नहीं था, बस दो ज़िद्दी दिल थे, और एक तीसरा शख्स जिसने सही वक्त पर ग़लत चाल चल दी।