वो सफ़ेद अंबेसडर, बंधी आंखें, और शोले का पोस्टर — जब अंडरवर्ल्ड ने उठा लिया फ़िल्म इंडस्ट्री के एक प्रोड्यूसर को?
एक शाम, जो शुरू हुई थी दफ़्तर के लिए निकलने से, और खत्म हुई एक ऐसे कमरे में जहां डर के सिवा कुछ नहीं था।
वर्ली की उस सड़क पर शाम के करीब चार बज रहे थे। मुशीर आलम अपने दफ़्तर के लिए निकले ही थे कि एक सफ़ेद अंबेसडर कार ने अचानक ओवरटेक करके उनकी गाड़ी रोक ली। उन्हें कुछ समझ आता, इससे पहले तीन हथियारबंद लोग उस कार से बाहर निकले, उन्हें ज़बरदस्ती खींचकर अपनी अंबेसडर में धकेल दिया, और कार में बैठते ही उनकी आंखों पर काली पट्टी बांध दी गई। ये कोई फ़िल्म का सीन नहीं था — ये 22 सितंबर, 1984 की एक असली शाम थी, और मुशीर आलम, जो उस वक्त दिलीप कुमार व अमिताभ बच्चन अभिनीत "शक्ति" फ़िल्म के प्रोड्यूसर थे, अपनी ज़िंदगी के सबसे डरावने कुछ घंटों में दाखिल हो चुके थे।
मुशीर-रियाज़ — वो जोड़ी जिसने इंडस्ट्री को कई बड़ी फ़िल्में दीं
1980 के दशक में मुशीर आलम और मोहम्मद रियाज़ की जोड़ी — जिसे इंडस्ट्री में मुशीर-रियाज़ के नाम से जाना जाता था — फ़िल्म प्रोडक्शन की दुनिया का एक बड़ा नाम थी। बैराग, अपने पराए, राजपूत जैसी कई उल्लेखनीय फ़िल्में इस जोड़ी ने प्रोड्यूस की थीं, और अब वो दिलीप कुमार व अमिताभ बच्चन जैसे दो दिग्गजों को लेकर "शक्ति" जैसी बड़ी फ़िल्म बना रहे थे। इंडस्ट्री में इनका रुतबा था, पैसा था, पहचान थी। और शायद यही वजह भी बनी उस हादसे की, जिसने पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को हिला दिया।
अंबेसडर कार में बैठते ही मुशीर आलम पहले तो बुरी तरह घबरा गए। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है, क्यों हो रहा है, और अब आगे क्या होगा। मगर धीरे-धीरे उन्होंने खुद को संभाला। किसी तरह उन्होंने आंखों पर बंधी पट्टी के नीचे से थोड़ा झांककर बाहर का नज़ारा देखने की कोशिश की। और जो उन्होंने देखा, वो एक अजीब इत्तेफ़ाक था — "शोले" फ़िल्म का एक पोस्टर। (सोचिए ज़रा, एक फ़िल्म इंडस्ट्री का आदमी, अगवा होकर ले जाया जा रहा है, और रास्ते में उसे एक और फ़िल्म का पोस्टर नज़र आता है — कैसी अजीब विडंबना है ये।) कुछ देर बाद उन्हें बच्चों की आवाज़ें सुनाई दीं — बच्चे कुरान पढ़ रहे थे। इससे उन्हें अंदाज़ा हुआ कि वो किसी घनी आबादी वाले, धार्मिक रूप से सक्रिय इलाके के करीब हैं।
लकड़ी की सीढ़ियां, एक खाली कमरा, और फिरौती की मांग
मुशीर आलम को कुछ सीढ़ियां और रेलिंग से चढ़ाकर एक खाली कमरे में ले जाया गया। चढ़ते वक्त उन्होंने महसूस किया कि सीढ़ियां लकड़ी की हैं — एक छोटी सी डिटेल, जो आगे चलकर बहुत काम आने वाली थी। कमरे में पहुंचते ही उनकी आंखों से पट्टी हटा दी गई, और उसके तुरंत बाद उन्हें धमकाया जाने लगा। उनके साथ मारपीट भी हुई। किडनैपर्स की मांग थी पच्चीस लाख रुपए — उस दौर के हिसाब से एक बहुत बड़ी रकम। लंबी बातचीत के बाद आखिरकार सौदा तीन लाख रुपए पर तय हुआ, और रकम मिलते ही किडनैपर्स ने मुशीर आलम को छोड़ दिया।
यह घटना उस दौर के मशहूर क्राइम रिपोर्टर एस. हुसैन ज़ैदी ने अपने यूट्यूब चैनल पर विस्तार से साझा की थी, और इसका ज़िक्र क्राइम ब्रांच के पूर्व अफ़सर इसाक़ बागवान ने अपनी किताब में भी किया है। बागवान अपनी किताब में लिखते हैं कि एक कॉन्स्टेबल ने उन्हें बताया था कि दिलीप कुमार कमिश्नर के दफ़्तर आए हैं, और शुरू में उन्हें लगा कि शायद ये किसी बंदूक लाइसेंस या निजी सुरक्षा से जुड़ा सामान्य मामला होगा। मगर जब वो पहुंचे तो देखा कि कमिश्नर रिबेरो के दफ़्तर में दिलीप कुमार के साथ दो और लोग बैठे हैं — मुशीर आलम और मोहम्मद रियाज़ खुद।
जब फ़िल्म इंडस्ट्री में उबाल आ गया, और दिलीप कुमार खुद मैदान में उतरे
जब तक मुशीर आलम रिहा होकर घर लौटे, तब तक इंडस्ट्री में ये खबर आग की तरह फैल चुकी थी। हर तरफ़ हैरानी थी, और गुस्सा भी। फ़िल्म इंडस्ट्री का एक इतना बड़ा प्रोड्यूसर, दिन-दहाड़े सड़क से उठा लिया गया — ये बात किसी के गले नहीं उतर रही थी। इसी माहौल में दिलीप कुमार ने खुद आगे बढ़कर इस मामले की गहन जांच की मांग उठाई। वो सिर्फ़ मांग तक सीमित नहीं रहे — वो खुद मुशीर आलम और मोहम्मद रियाज़ को लेकर पुलिस कमिश्नर के दफ़्तर पहुंचे।
वहां इसाक़ बागवान ने मुशीर आलम से बड़ी बारीकी से सवाल-जवाब किए। हाजी अली से उस कमरे तक पहुंचने में कितना वक्त लगा था? रास्ते में कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ी थीं? जहां रखा गया, वहां किस तरह की गंधें आ रही थीं? ये सारे सवाल किसी आम पूछताछ जैसे नहीं लगते, पर एक अनुभवी जांच अफ़सर के लिए यही वो बारीक धागे होते हैं जो किसी वारदात की तह तक पहुंचाते हैं। मुशीर आलम ने अपनी याददाश्त के आधार पर इन सारे सवालों के बहुत सटीक जवाब दिए, और बागवान ने अपने तजुर्बे से अंदाज़ा लगाया कि उन्हें नागपाड़ा इलाके में कहीं रखा गया होगा।
और यही अंदाज़ा सही साबित हुआ। पुलिस नागपाड़ा पहुंची, और मुशीर आलम की दी गई जानकारी के सहारे वो कमरा भी ढूंढ निकाला जहां उन्हें बंधक बनाकर रखा गया था। पुलिस को देखते ही आस-पास भीड़ जमा हो गई। पूछताछ में पता चला कि वो कमरा अमीरज़ादा-आलमज़ेब गिरोह का इनक्वायरी रूम था। यानी अब ये साफ़ हो चुका था कि किस गिरोह ने इस पूरी वारदात को अंजाम दिया।
जांच में एक और परत खुली — जो शायद सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली थी। पता चला कि मुशीर आलम के साथ ही काम करने वाले किसी शख्स ने ये पूरी साज़िश रची थी। इस गिरोह का नाम था अमीरज़ादा-आलमज़ेब गिरोह, जो उन दिनों दाऊद इब्राहिम का विरोधी गिरोह माना जाता था। कहा जाता है कि दाऊद की हत्या की साज़िश में इस गिरोह का पैसा खत्म हो चुका था, और इसी वजह से उन्होंने पैसों के लिए मुशीर आलम को निशाना बनाया। जिस शख्स ने गिरोह को मुशीर आलम की पूरी जानकारी दी थी, उसका नाम था अहमद सय्यद खान — जिसका काम ही यही था कि वो फ़िल्म इंडस्ट्री के अमीर लोगों से जान-पहचान बनाए, और इस काम में वो काफ़ी हद तक कामयाब भी रहा था।
क्या ये सिर्फ़ पैसों की भूख थी, या फिर एक बड़े गैंगवार की छोटी सी कड़ी? शायद दोनों। "शक्ति" जैसी भव्य फ़िल्म की शूटिंग के बीचोंबीच घटी ये घटना आज भी बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के उलझे हुए रिश्तों की सबसे चौंकाने वाली मिसालों में गिनी जाती है — एक ऐसा किस्सा, जिसमें असल ज़िंदगी की साज़िश, किसी भी फ़िल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं थी।