क्या मिथुन-श्रीदेवी का वो अफ़ेयर सच में हुआ था, या सिर्फ़ एक कहानी बन गई?
एक फ़िल्म, दो सितारे, और एक ऐसी अफ़वाह जो चालीस साल बाद भी बॉलीवुड की गलियारों में घूमती रहती है — जाग उठा इंसान की पूरी कहानी।
1984 की उस गर्मियों में, जब जाग उठा इंसान के सेट पर कैमरे चल रहे थे, फ़िल्मी पत्रिकाओं के दफ़्तरों में एक अलग ही हलचल थी। मिथुन चक्रवर्ती और श्रीदेवी — दोनों पहली बार एक साथ स्क्रीन शेयर कर रहे थे, और स्टारडस्ट से लेकर सिने ब्लिट्ज़ तक, हर पत्रिका के पन्नों पर इन दोनों के नाम जुड़ने लगे थे। मगर एक पेच था। मिथुन चक्रवर्ती तब शादीशुदा थे — योगिता बाली से उनकी शादी हो चुकी थी, और घर में बच्चे भी थे। फिर भी, शूटिंग के दिनों में जो चर्चा शुरू हुई, वो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। अब यहाँ साफ़ कर दूं — ये जो कहानी है, वो पूरी तरह अफ़वाह के दायरे में आती है। इसका कोई आधिकारिक प्रमाण कभी सामने नहीं आया। मगर उस दौर की फ़िल्मी पत्रिकाओं में ये चर्चा इतनी ज़्यादा छपी कि ये बॉलीवुड के सबसे मशहूर "किस्सों" में गिनी जाने लगी। कहा जाता है कि शूटिंग के दौरान ही दोनों के बीच नज़दीकियां बढ़ीं, और फ़िल्म पूरी होते-होते ये सिर्फ़ पर्दे की केमिस्ट्री नहीं रह गई थी।
जब फ़िल्म रिलीज़ हुई, तब कहानी पलट गई
जाग उठा इंसान 6 जुलाई 1984 को रिलीज़ हुई। और उसके ठीक बाद, फ़िल्मी हलकों में एक नई कहानी फैलने लगी — कि मिथुन और श्रीदेवी का रिश्ता टूट गया है, और श्रीदेवी ने ऐलान कर दिया है कि वो अब मिथुन के अपोज़िट काम नहीं करेंगी। ये ख़बर उस दौर में इतनी फैली कि कई पत्रिकाओं ने इसे लगभग तय मान लिया। लेकिन ख़ुद श्रीदेवी ने इस पर सफ़ाई दी थी। उनका कहना था कि उन्होंने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही कि वो मिथुन के अपोज़िट किसी फ़िल्म में काम नहीं करेंगी। उन्होंने सिर्फ़ एक ख़ास फ़िल्म को ठुकराया था, और वजह ये थी कि उसमें उन्हें एक बेहद मामूली और छोटा रोल ऑफ़र किया जा रहा था — रिश्ते से इसका कोई लेना-देना नहीं था, ऐसा उन्होंने साफ़ किया। ज़रा सोचिए — एक अभिनेत्री, जो उस दौर में अपने करियर के उभार पर थी, वो भला क्यों किसी छोटे रोल के लिए हामी भरती? उसकी बात में दम था। फिर भी, एक बार जब कोई कहानी फ़िल्मी पत्रिकाओं में छप जाती है, तो उसे मिटाना आसान नहीं होता। और यही हुआ भी — दशकों बाद तक, हर बार जब मिथुन और श्रीदेवी का ज़िक्र एक साथ होता, इस अफ़ेयर की चर्चा भी साथ चल पड़ती। सच क्या था, झूठ क्या था — ये तो शायद वही दोनों जानते थे। बाकी सब कयास ही रहे।
के. विश्वनाथ की फ़िल्म, और श्रीदेवी की फ़ीस में कटौती
अब ज़रा फ़िल्म की तरफ़ लौटते हैं, क्योंकि इसकी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। जाग उठा इंसान दरअसल के. विश्वनाथ की 1981 की तेलुगु फ़िल्म सप्तपदी का हिंदी रीमेक थी। कहानी एक दलित युवक और एक ब्राह्मण युवती की प्रेम कहानी पर आधारित थी — उस दौर के हिसाब से एक साहसी और सामाजिक रूप से संवेदनशील विषय। कहा जाता है कि श्रीदेवी के. विश्वनाथ का बेहद सम्मान करती थीं, और उनके निर्देशन में काम करना चाहती थीं। इसीलिए जब उन्हें ये फ़िल्म ऑफ़र हुई, उन्होंने बिना ज़्यादा सोचे-विचारे इसे साइन कर लिया — यहां तक कि इस फ़िल्म के लिए उन्होंने अपनी फ़ीस भी घटा दी। ये अपने आप में एक बड़ी बात थी, क्योंकि उस दौर में श्रीदेवी हिंदी सिनेमा की सबसे मांग वाली अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगी थीं। फ़िल्म के निर्माता थे राकेश रोशन, जिन्होंने ख़ुद भी इसमें एक अहम किरदार निभाया। बाक़ी कलाकारों में देवेन वर्मा, सुजीत कुमार और जे.वी. सोमयाजुलू शामिल थे। संगीत राजेश रोशन ने दिया था। और सिनेमैटोग्राफ़ी के लिए पी.एल. राज को फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड भी मिला — यानी सिर्फ़ कहानी ही नहीं, तकनीकी पक्ष पर भी फ़िल्म को सराहा गया था।
दिलचस्प बात ये है कि इस फ़िल्म के मुख्य किरदार के लिए पहली पसंद मिथुन चक्रवर्ती नहीं, बल्कि ऋषि कपूर थे। मगर उन दिनों ऋषि कपूर कई दूसरी फ़िल्मों में उलझे हुए थे, और डेट्स का मेल न बैठ पाने की वजह से उन्होंने ये फ़िल्म करने से मना कर दिया। इसी तरह, श्रीदेवी वाला किरदार पहले जया प्रदा को ऑफ़र हुआ था, लेकिन वो उस वक़्त शराबी की शूटिंग में व्यस्त थीं, इसलिए उन्होंने भी इस फ़िल्म से दूरी बना ली।
यहाँ रुककर सोचिए — अगर ऋषि कपूर और जया प्रदा दोनों ने हामी भर दी होती, तो शायद फ़िल्मी इतिहास का वो पूरा अध्याय ही अलग होता जिसमें मिथुन-श्रीदेवी की जोड़ी और उसके इर्द-गिर्द की चर्चाएं दर्ज हैं। कास्टिंग में ये छोटे-छोटे इत्तेफ़ाक़ कई बार पूरी कहानी बदल देते हैं। और शायद यही वजह है कि फ़िल्म इंडस्ट्री में हमेशा कहा जाता है — सही वक़्त पर सही मौक़ा मिलना भी क़िस्मत की बात होती है।
चालीस साल बाद भी ज़िंदा है ये कहानी
आज, 2026 में, जाग उठा इंसान को रिलीज़ हुए 41 साल से ज़्यादा हो चुके हैं। मिथुन चक्रवर्ती आज भी सक्रिय हैं, फ़िल्मों में काम कर रहे हैं, और हाल के सालों में उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार जैसे बड़े सम्मान भी मिल चुके हैं। दूसरी तरफ़ श्रीदेवी अब हमारे बीच नहीं हैं — 2018 में उनका असामयिक निधन हो गया था, और उनकी विरासत आज भी हिंदी व दक्षिण भारतीय सिनेमा में उतनी ही गहरी महसूस होती है जितनी उनके जीते-जी थी। फिर भी, जब कभी पुराने बॉलीवुड की बातें होती हैं, जाग उठा इंसान और उससे जुड़ी ये चर्चा बार-बार लौट आती है। ये फ़िल्म पत्रकारिता का वो दौर था जब हर हफ़्ते नई पत्रिका में कोई न कोई "एक्सक्लूसिव" कहानी छपती थी, और सितारों की निजी ज़िंदगी पर क़यास लगाना ही सबसे बड़ा मसाला हुआ करता था। आज के दौर में, जब सोशल मीडिया पर हर बात मिनटों में वायरल हो जाती है, उस दौर की धीमी, मगर गहरी अफ़वाहों की गूंज सुनना अपने आप में दिलचस्प है। खैर, ये तो सबको पता ही है कि फ़िल्मी दुनिया में अफ़वाहें और हक़ीक़त के बीच की लकीर हमेशा धुंधली रही है। मिथुन-श्रीदेवी की कहानी भी शायद उसी धुंधली लकीर पर कहीं खड़ी है — न पूरी तरह सच, न पूरी तरह झूठ। बस एक याद, जो फ़िल्मी इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गई।