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Buzz · Parde Ke Peeche

राज कपूर की बीमारी ने ऋषिकेश मुखर्जी को "आनंद" लिखने पर मजबूर कर दिया था?

सिया मेहरा 13 Jul 2026 6,101 views

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राज कपूर की बीमारी ने ऋषिकेश मुखर्जी को "आनंद" लिखने पर मजबूर कर दिया था?

एक दोस्त की तकलीफ़ से जन्मी एक ऐसी फ़िल्म, जिसका एक डायलॉग आज तक हर किसी की ज़ुबान पर है।

"बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं" — ये लाइन सुनते ही आंखें भर आती हैं, चाहे कोई कितनी भी बार देख चुका हो "आनंद"। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि ये फ़िल्म किसी काल्पनिक कहानी से नहीं, बल्कि एक असली दोस्ती और एक असली बीमारी से निकली थी। 1998 के एक इंटरव्यू में ऋषिकेश मुखर्जी — जिन्हें सब प्यार से ऋषि दा कहते थे — ने खुद कबूल किया था कि "आनंद" दरअसल एक बायोग्राफिकल फ़िल्म थी। उनके शब्दों में, आनंद बनाने का ख़याल उन्हें तब आया जब राज कपूर से उनकी दोस्ती गहरी हो चुकी थी — और राज कपूर उस वक़्त बहुत बीमार पड़ गए थे।

जब राज कपूर बीमारी से भी मुस्कुराते रहे

राज कपूर उन दिनों पल्स से जुड़ी किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। स्थिति सच में नाज़ुक थी — पर राज कपूर ने कभी अपनी तकलीफ़ को अपने चेहरे पर नहीं आने दिया। वो हंसते रहे, मज़ाक करते रहे, आशावादी बने रहे — बिल्कुल वैसे ही जैसे परदे पर "आनंद" का किरदार करता है। यही वो भावना थी जिसने ऋषि दा के अंदर एक कहानी को जन्म दिया। और डॉक्टर भास्कर बनर्जी का किरदार — जिसे परदे पर अमिताभ बच्चन ने निभाया — वो कोई और नहीं, ख़ुद ऋषि दा से प्रेरित था। एक ऐसा दोस्त, जिसे अपने दोस्त की जान की फ़िक्र खाए जा रही है, पर जो उस फ़िक्र को अपने दोस्त के सामने ज़ाहिर नहीं होने देता।

ऋषि दा ने उसी इंटरव्यू में एक बहुत निजी बात भी शेयर की थी — राज कपूर को लेकर उनके मन में जो डर था, उसे उन्होंने बिना किसी झिझक के कबूल किया।

ऋषि दा ने कहा था — मैं सोचता था कि अगर राज को कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? हम सबको राज की बहुत फ़िक्र होती थी। लेकिन वो हमेशा मुस्कुराता रहता था। फ़िल्म में आनंद भी तो ऐसे ही मुस्कुराता रहता है, जबकि डॉक्टर भास्कर बनर्जी को उसकी फ़िक्र लगी रहती है। ये सिर्फ़ एक फ़िल्मी संवाद नहीं था — ये एक निर्देशक की अपने दोस्त के लिए वो सच्ची फ़िक्र थी, जो बरसों बाद भी परदे पर उतनी ही गहराई से महसूस होती है।

यही वो जगह है जहां "आनंद" सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं रह जाती — वो एक श्रद्धांजलि बन जाती है, एक दोस्त की तरफ़ से दूसरे दोस्त के लिए। ऋषि दा ने उस इंटरव्यू में ये भी बताया था कि उन्होंने ये पूरी फ़िल्म मात्र तीस दिनों में पूरी कर ली थी — इतनी बड़ी इमोशनल कहानी, इतने कम वक़्त में, ये अपने-आप में एक कमाल की बात है। शूटिंग के दौरान वो राजेश खन्ना को प्यार से "पिंटू बाबा" कहकर बुलाया करते थे।

राजेश खन्ना लीड नहीं, सेकेंड लीड थे — ऋषि दा का साफ़ बयान

अब यहां एक ऐसी बात है जो आज भी कई लोगों को चौंका देती है। ऋषि दा ने उसी इंटरव्यू में बिल्कुल साफ़ शब्दों में कहा था कि राजेश खन्ना "आनंद" के लीड हीरो नहीं थे — ये ज़िम्मेदारी अमिताभ बच्चन के कंधों पर थी। वजह भी उन्होंने खुद बताई थी — अमिताभ का किरदार फ़िल्म के आखिर तक मौजूद रहता है, और उसी किरदार की नज़र से दर्शकों को आनंद की पूरी कहानी पता चलती है। राजेश खन्ना, ऋषि दा के मुताबिक, सेकेंड लीड थे।

ये बात उस दौर में और भी दिलचस्प हो जाती है जब राजेश खन्ना अपने करियर के सबसे बड़े सुपरस्टारडम के दौर में थे। तब उनके नाम पर फ़िल्में चलती थीं, उनकी दीवानगी किसी अफ़वाह की मोहताज नहीं थी — ये सार्वजनिक रूप से खूब चर्चित रहा तथ्य है। ऐसे वक़्त में एक निर्देशक का ये कहना कि फ़िल्म का असली सूत्रधार कोई और है, ये ऋषि दा के कॉन्फिडेंस और उनकी क्राफ्टमैनशिप को दिखाता है। और एक बात और — जब अमिताभ बच्चन को डॉक्टर भास्कर बनर्जी के रोल के लिए कास्ट किया गया, तब कुछ लोगों ने इस फ़ैसले पर सवाल भी उठाए थे। पर ऋषि दा को पूरा यक़ीन था कि अमिताभ ही उस किरदार के लिए सही चुनाव हैं। यही तो एक अनुभवी जौहरी की पहचान होती है — जो हीरे को तराशने से पहले ही पहचान लेता है।

एक ही तारीख, दो बड़ी मौतें — तीस साल का फ़ासला

आज ऋषिकेश मुखर्जी साहब की पुण्यतिथि है। 27 August 2006 के दिन ऋषि दा 84 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। और यहां एक इत्तेफ़ाक है जो सोचने पर मजबूर कर देता है — ऋषि दा के एक बहुत क़रीबी दोस्त, महान गायक मुकेश जी की मृत्यु भी ठीक इसी तारीख को हुई थी, यानी 27 August 1976 को — ऋषि दा की मृत्यु से पूरे तीस साल पहले। एक ही तारीख, दो अलग-अलग साल, दो ऐसी शख़्सियतें जो एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी थीं।

और यहीं से एक और कड़ी जुड़ती है — मुकेश जी के बेटे नितिन मुकेश, ऋषि दा के शागिर्द थे। एक वक़्त ऐसा भी था जब नितिन मुकेश फ़िल्ममेकर बनना चाहते थे, बिल्कुल ऋषि दा की तरह। उन्होंने काफ़ी अरसे तक ऋषि दा के असिस्टेंट के तौर पर काम भी किया। पर ज़िंदगी ने कुछ और ही लिखा था — मुकेश जी की अचानक मृत्यु ने नितिन मुकेश के फ़िल्ममेकर बनने के सपने को अधूरा छोड़ दिया।

सोचिए ज़रा — एक तरफ़ ऋषि दा, जिन्होंने अपने दोस्त की बीमारी से एक कालजयी फ़िल्म रच दी, और दूसरी तरफ़ मुकेश जी का बेटा, जिसका फ़िल्ममेकर बनने का सपना पिता की मृत्यु के साथ ही दफ़न हो गया। ज़िंदगी और मौत, सपने और हक़ीक़त, दोस्ती और विरासत — ये सारी कड़ियां किसी न किसी तरह ऋषि दा के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती हैं। शायद यही वजह है कि "आनंद" आज भी उतनी ही असर छोड़ती है जितनी पहले दिन छोड़ी थी — क्योंकि उसमें कोई काल्पनिक ग़म नहीं था, वो एक असली दोस्ती की, असली फ़िक्र की कहानी थी।