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Buzz · Parde Ke Peeche

ज़िद्दी में आशीष विद्यार्थी की मौत होनी थी, फिर अचानक स्क्रिप्ट में क्या बदल गया?

रेहान आहूजा 14 Jul 2026 9,214 views

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ज़िद्दी में आशीष विद्यार्थी की मौत होनी थी, फिर अचानक स्क्रिप्ट में क्या बदल गया?

एक हड़ताल, एक एडिटिंग टेबल पर लिया गया फ़ैसला, और एक ऐसा किरदार जो मरते-मरते बच गया — ज़िद्दी की यह कहानी बताती है कि कैसे फ़िल्में सेट पर बनते-बनते बदल जाती हैं।

1997 में आई सनी देओल की ज़िद्दी उस दौर की सबसे बड़ी हिट फ़िल्मों में गिनी जाती है — गुड्डु धनोआ के डायरेक्शन में बनी इस फ़िल्म ने साढ़े सात करोड़ के बजट में क़रीब बत्तीस करोड़ रुपए की कमाई की थी। पर बहुत कम लोगों को पता है कि इस फ़िल्म में आशिष विद्यार्थी का किरदार, ए.सी.पी. इंदर सक्सेना, जिसे हमने और आपने परदे पर मुख्य विलेन के तौर पर देखा, शुरुआत में उतना बड़ा लिखा ही नहीं गया था। स्क्रिप्ट के मुताबिक़ इस किरदार को फ़िल्म ख़त्म होने से काफ़ी पहले ही मार दिया जाना था।

वो हड़ताल जिसने पूरी शूटिंग रोक दी

ज़िद्दी की शूटिंग के दौरान अचानक एक हड़ताल हो गई, जिसकी वजह से फ़िल्म का काम कई दिनों के लिए ठप पड़ गया। जब आख़िरकार हड़ताल ख़त्म हुई, तो पूरी यूनिट फ़िल्मालय स्टूडियो पहुंची और शूटिंग दोबारा शुरू हुई। इस बार जो सीन फ़िल्माया जाना था वो था देवा (सनी देओल) का इंदर सक्सेना के घर पहुंचना — जहां वो अपने भाई के पेन की कैप देखकर समझ जाता है कि उसके भाई का क़त्ल इंदर ने ही करवाया था। आशिष विद्यार्थी को यह बात पता थी कि यही उनका आख़िरी सीन है, और वो बेसब्री से इसके पूरा होने का इंतज़ार कर रहे थे, ताकि वो शूट से फ़ारिग़ हो सकें।

पर दो दिन गुज़र गए और वो सीन शूट ही नहीं हुआ। आशिष विद्यार्थी बेचैन हो उठे। उन्होंने कई बार फ़िल्म के एक्शन डायरेक्टर टीनू वर्मा से पूछा कि आख़िर सीन कब शूट होगा, पर हर बार उन्हें बस रुकने को कह दिया जाता। तीसरे दिन शाम को आशिष विद्यार्थी ने टीनू वर्मा के एक असिस्टेंट को पकड़ लिया और उससे साफ़-साफ़ पूछ लिया कि उनकी मौत वाला सीन आख़िर कैसे शूट होगा।

कहा जाता है कि उस असिस्टेंट ने आशिष विद्यार्थी को बताया कि सीन में उन्हें एक शीशे के दरवाज़े से टकराना है। यह सुनकर आशिष विद्यार्थी घबरा गए और तुरंत पूछा कि अगर शीशे से टकराएंगे तो कांच शरीर में तो नहीं घुस जाएगा? असिस्टेंट ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वो असली शीशा नहीं है, टूटने वाला नक़ली प्रॉप-ग्लास है, और शीशा तोड़कर उन्हें वहां से भाग जाना है। यह सुनकर आशिष विद्यार्थी और हैरान हो गए — उन्होंने पूछा कि भागना क्यों है, उन्हें तो मरना था। जवाब मिला कि अब उन्हें मरना नहीं है, बस भाग जाना है। आशिष विद्यार्थी को कुछ समझ नहीं आया, और उन्होंने ख़ुद पता लगाने की ठानी कि आख़िर माजरा क्या है।

एडिटिंग टेबल पर बदल गई क़िस्मत

जो बात आशिष विद्यार्थी को पता चली, वो वाक़ई दिलचस्प थी। हड़ताल के दौरान जब शूटिंग रुकी हुई थी, तब तक जितना हिस्सा फ़िल्माया जा चुका था, उसे एडिट किया जा रहा था। इसी एडिटिंग के दौरान डायरेक्टर गुड्डु धनोआ ने ग़ौर किया कि आशिष विद्यार्थी अपने किरदार में बेहद असरदार लग रहे हैं, और उनका रोल बढ़ाया जाना चाहिए। धनोआ ने यह बात सनी देओल से भी साझा की, और सनी देओल भी इस राय से पूरी तरह सहमत हुए कि इस विलेन को इतनी जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहिए। नतीजा यह निकला कि जो किरदार शुरू में एक बीच के ट्विस्ट भर के लिए लिखा गया था, वो फ़िल्म का सबसे यादगार और डरावना विलेन बनकर उभरा — इतना असरदार कि आज भी कई दर्शक कहते हैं कि आशिष विद्यार्थी ने उन्हें अपनी पूरी ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा डराया था।

फ़िल्म के आख़िरी क्लाइमैक्स में, जब असल कहानी परदे पर उतरी, तो इंदर सक्सेना का अंत देवा के हाथों नहीं, बल्कि देवा के पिता, वकील अशोक प्रधान (अनुपम खेर) के हाथों हुआ — यह भी उस बदले हुए स्क्रिप्ट का हिस्सा था जो एडिटिंग टेबल पर लिए गए उस फ़ैसले के बाद आकार लेती गई। सोचिए ज़रा — अगर वो हड़ताल न हुई होती, अगर एडिटर और डायरेक्टर की नज़र उन शुरुआती रश्ज़ पर न पड़ी होती, तो शायद ज़िद्दी का सबसे यादगार विलेन फ़िल्म के आधे हिस्से में ही ख़त्म हो चुका होता।

खैर, यह तो सबको पता है कि ज़िद्दी आज भी सनी देओल की सबसे यादगार एक्शन फ़िल्मों में गिनी जाती है — जीत, घातक, अजय और बॉर्डर की उस लगातार हिट सीरीज़ का हिस्सा, जिसने नब्बे के दशक में सनी देओल को एक्शन का बादशाह बना दिया था। पर इस फ़िल्म का सबसे बड़ा सस्पेंस परदे पर नहीं, बल्कि सेट के पीछे छुपा था — एक ऐसा किरदार जो मरते-मरते बच गया, और आगे चलकर पूरी फ़िल्म का सबसे डरावना चेहरा बन गया।