वो आवाज़ जिसने राज कपूर को अपनी रूह बना लिया — मुकेश की कहानी किसने सुनी है?
मुकेश की ज़िंदगी की कहानी उस आवाज़ से शुरू होती है जो कभी उनकी अपनी नहीं मानी गई — और फिर एक दिन पूरे हिंदुस्तान की आवाज़ बन गई। यह उनके इश्क़, उनके संघर्ष और उनकी वफ़ादारी की कहानी है, जिसे आज भी उतनी ही नर्मी से याद किया जाता है।
वो शाम कांदिवली के एक छोटे से मंदिर की थी, 22 जुलाई 1946। सामने खड़े थे मुकेश चंद माथुर, हाथों में मेहंदी लगाए एक अठारह साल की लड़की — सरल त्रिवेदी। दोनों के परिवार वहां नहीं थे। दो दोस्त थे बस, और एक अभिनेता जिसने आगे बढ़कर कन्यादान का फ़र्ज़ निभाया। यह मोतीलाल जी थे — वही मोतीलाल जिन्होंने कुछ साल पहले मुकेश को दिल्ली की एक शादी में गाते सुना था और उन्हें बंबई बुला लिया था। किसे पता था कि जिस आदमी ने मुकेश को इंडस्ट्री का रास्ता दिखाया, वही एक दिन उनकी शादी में बाप की जगह खड़ा होगा।
दिल्ली का एक लड़का, और एक आवाज़ जो ग़लती से मिली
मुकेश चंद माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में हुआ था, एक मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार में, जहां वो दस भाई-बहनों में छठे नंबर पर थे। पिता इंजीनियर थे, घर में गाने-बजाने का कोई खास चलन नहीं था। मुकेश की बहन को संगीत सिखाने के लिए एक उस्ताद घर आते थे, और छोटा मुकेश दीवार के पीछे से सुनता रहता। शायद वहीं से शुरुआत हुई इस सफ़र की — छिपकर सुनना, फिर चुपके से गुनगुनाना।
किस्मत का पहला मोड़ तब आया जब मोतीलाल — जो मुकेश के दूर के रिश्तेदार भी थे — उनकी बहन की शादी में मुकेश को गाते सुन बैठे। मोतीलाल उस दौर के जाने-माने अभिनेता थे, और उन्हें इस लड़के की आवाज़ में कुछ दिख गया। वो मुकेश को अपने साथ बंबई ले आए, अपने घर ठहराया, पंडित जगन्नाथ प्रसाद से गाने की तालीम दिलवाई। उस ज़माने में गाना सीखना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि हीरो को परदे पर ख़ुद गाना पड़ता था — प्लेबैक सिंगिंग का चलन अभी ठीक से शुरू नहीं हुआ था।
मुकेश ने पहले अभिनेता बनने की कोशिश की। 1941 की फ़िल्म निर्दोष में उन्होंने ख़ुद अभिनय भी किया और गाना भी गाया — फ़िल्म नहीं चली। दुख-सुख और अदब अर्ज़ भी फ्लॉप रहीं। ऐसा लगने लगा था कि यह लड़का शायद अभिनेता के तौर पर टिक नहीं पाएगा। लेकिन 1945 में मोतीलाल की ही फ़िल्म पहली नज़र के लिए मुकेश ने प्लेबैक गाया — "दिल जलता है तो जलने दे।" और यहीं से किस्मत ने करवट ली। यह गाना इतना हिट हुआ कि कहते हैं ख़ुद के.एल. सहगल — जो मुकेश के आइडल थे — ने सुनकर पूछ लिया था कि यह गाना उन्होंने कब रिकॉर्ड किया, इतनी हूबहू नक़ल थी उनकी आवाज़ की। बाद में संगीतकार अनिल विश्वास ने मुकेश को सलाह दी कि सहगल की नक़ल छोड़कर अपनी आवाज़ ढूंढें — और मुकेश ने वही किया।
वो लड़की जो शिव मंदिर हर सोमवार जाती थी
सरल त्रिवेदी एक अमीर गुजराती ब्राह्मण व्यापारी की बेटी थीं। मुकेश उनके भाई के दोस्त थे, इसी नाते घर आना-जाना लगा रहता था। धीरे-धीरे नज़रों का सिलसिला शुरू हुआ, फिर बातों का। मुकेश की शख़्सियत पर सरल फ़िदा थीं, सरल की सादगी पर मुकेश का दिल आ गया था। पर जब बात घरवालों तक पहुंची, तो साफ़ इनकार मिला। वजह भी साफ़ थी — मुकेश यूपी के एक कायस्थ माथुर परिवार से थे, मांसाहारी परिवार से, फ़िल्म इंडस्ट्री में काम करते थे जहां न तनख़्वाह पक्की थी न भविष्य। एक गुजराती ब्राह्मण घराने के लिए यह रिश्ता सोचने लायक भी नहीं था।
फिर भी दिल कहां मानते हैं। मुकेश का सरल के घर आना बंद कर दिया गया तो वो बाहर खड़े रहने लगे — घंटों, कई बार तेज़ बारिश में भी, बस एक झलक पाने के लिए। सरल का बाहर निकलना भी बंद हुआ, तो उनकी छोटी बहन और पड़ोस की एक सहेली ने संदेश पहुंचाने का काम अपने हाथ में ले लिया। सरल हर सोमवार पास के शिव मंदिर जाया करती थीं — यही एक खिड़की थी जो अभी खुली थी। एक दिन मुकेश ने कहला भेजा कि वो मंदिर के पास मिलें। घरवालों ने इस पर भी रोक लगा दी। सरल ने भूख हड़ताल कर दी — जब तक इजाज़त नहीं, कुछ नहीं खाएंगी। आख़िर घर वालों को झुकना पड़ा।
उस सुबह सरल नंगे पैर घर से निकलीं, एक शाम पहले हाथों पर मेहंदी लगवा चुकी थीं। मंदिर पर मुकेश अपने दो दोस्तों के साथ पहले से मौजूद थे। वहां से सब कांदिवली के एक और मंदिर पहुंचे, जहां चुपचाप शादी हो गई — मोतीलाल के कन्यादान के साथ। तारीख़ थी मुकेश का अपना जन्मदिन, 22 जुलाई। और दिलचस्प यह कि सरल का जन्मदिन भी उसी दिन पड़ता था — जिस दिन उन्होंने घर छोड़ा, उसी दिन वो अठारह साल की हुई थीं। दोनों के परिवारों ने इस शादी के टिकने की उम्मीद तक नहीं छोड़ी थी। कहा जाता है कि रिश्तेदारों में यह चर्चा आम थी कि "यह शादी साल भर भी नहीं चलेगी।" पर मुकेश-सरल तीस साल साथ रहे — ठीक उनकी मौत तक।
बरसों बाद बेटे नितिन मुकेश ने एक इंटरव्यू में याद किया कि पिता अपनी पत्नी के लिए "चांद सी महबूबा हो" गुनगुनाया करते थे — हिमालय की गोद में फ़िल्म का यह गीत मानो उनके अपने रिश्ते के लिए ही लिखा गया हो। नितिन ने यह भी बताया कि मां को पिता की बहुत याद आती थी, वो अक्सर कहतीं कि अगले जन्म में भी उन्हीं से मिलना चाहेंगी। तीस साल की शादी में झगड़े भी हुए, तंगी के दिन भी आए, पर दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कभी नहीं छोड़ा।
जब घर में सब्ज़ी वाला उधार देता था
यहां कहानी थोड़ी उदास हो जाती है। मुकेश का प्लेबैक करियर तो चल निकला था, पर उनके भीतर हीरो बनने की चाहत कभी मरी नहीं। उन्होंने ख़ुद प्रोडक्शन में हाथ आज़माया — मल्हार (1951) और अनुराग (1956) जैसी फ़िल्में बनाईं, ख़ुद अभिनय किया, ख़ुद संगीत भी दिया। दोनों फ़िल्में बुरी तरह पिट गईं। अनुराग तो रिलीज़ ही नहीं हो पाई, कहते हैं। इस दौर में घर पर आर्थिक संकट इस कदर गहरा गया कि बड़े बच्चे — रीता और नितिन — जिस स्कूल में पढ़ते थे, वहां फ़ीस बकाया होने की वजह से उन्हें एक बार परीक्षा में बैठने ही नहीं दिया गया। दोनों बच्चे पेडर रोड वाले स्कूल से रोते हुए पैदल घर लौटे थे।
नितिन मुकेश ने फ़िल्मफ़ेयर को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि पापा यह देखकर हैरान रह गए, स्कूल प्रिंसिपल के इस क़दम पर बहुत नाराज़ हुए — पर साथ ही यह भी समझ गए कि ग़लती उन्हीं की थी। नितिन ने यह भी खुलासा किया कि उन तंगी के दिनों में घर के पास का सब्ज़ी वाला अक्सर पिता को उधार दे दिया करता था। और जब कभी मुकेश का कोई गाना बिनाका गीतमाला में टॉप करता, तो पूरी चॉल में जश्न का माहौल बन जाता — मानो पूरे मोहल्ले की जीत हो। यह वो मुकेश थे जो चॉल में रहते हुए भी सुरों के बादशाह थे, और बादशाहत के बावजूद चॉल की ज़िंदगी से बाहर नहीं निकल पाए थे। सोचिए ज़रा — इतना बड़ा गायक, जिसकी आवाज़ पर पूरा मुल्क झूमता था, और घर में सब्ज़ी वाले का उधार चल रहा था। यही तो फ़िल्मी दुनिया की असली सच्चाई है, जो पर्दे पर कभी नहीं दिखती।
राज कपूर की "रूह" — यह रिश्ता कैसे बना
राज कपूर और मुकेश की जोड़ी हिंदी सिनेमा के सबसे ख़ूबसूरत रिश्तों में गिनी जाती है। शुरुआत में राज कपूर मन्ना डे को भी आज़मा रहे थे अपनी फ़िल्मों के लिए, पर आवारा (1951) से जो केमिस्ट्री मुकेश की आवाज़ और राज कपूर के उस "चार्ली चैपलिन जैसे आवारा" किरदार के बीच बनी, वो फिर कभी टूटी नहीं। श्री 420, अनाड़ी, संगम, मेरा नाम जोकर — हर फ़िल्म में मुकेश की आवाज़ राज कपूर के दर्द, उनकी मासूमियत, उनकी बग़ावत का हिस्सा बन गई। यही वजह थी कि राज कपूर अक्सर कहा करते थे कि मुकेश उनकी "रूह" हैं — यह बात इंडस्ट्री में इतनी मशहूर हुई कि आज भी दोनों के नाम एक साथ लिए जाते हैं।
दोनों के बीच सिर्फ़ पेशेवर रिश्ता नहीं था। नितिन मुकेश ने एक इंटरव्यू में बताया कि यह दोस्ती अगली पीढ़ी तक चली — जब राज कपूर के बेटे ऋषि कपूर और नितिन मुकेश बड़े हुए, तो उनके बीच भी वैसी ही आत्मीयता रही जैसी उनके पिताओं के बीच थी। मेरा नाम जोकर में जब ऋषि कपूर चौदह साल के थे, तो नितिन ने उनके लिए एक गाने का हिस्सा गाया था, जबकि मुकेश ने ख़ुद ऋषि के लिए "तीतर के दो आगे तीतर" गाया — इस पर दोनों बच्चों में मीठी नोकझोंक भी हुई कि किसका गाना पहले फ़िल्माया गया। मुकेश और राज कपूर की आख़िरी रिकॉर्डिंग साथ में हुई थी फ़िल्म धरम करम (1975) के गाने "एक दिन बिक जाएगा" के लिए — मानो किस्मत ने ख़ुद यह गाना चुना हो, अनजाने में एक विदाई गीत की तरह।
कहा जाता है कि इंडस्ट्री के अंदरूनी हलकों में यह चर्चा रहती थी कि मुकेश-राज कपूर की जोड़ी को शंकर-जयकिशन और गीतकार शैलेंद्र-हसरत जयपुरी का पूरा साथ मिला — यह पूरी टीम एक-दूसरे के लिए क़िस्मत का ताला-चाबी थी। जब मुकेश की अपनी प्रोडक्शन कंपनी की फ़िल्में डूब रही थीं, तब इसी दोस्ती ने उन्हें दोबारा खड़ा होने का मौक़ा दिया। फ़िल्म आनारी की कामयाबी के बाद मुकेश की प्लेबैक करियर ने फिर रफ़्तार पकड़ी — और यह मुमकिन हुआ क्योंकि राज कपूर और उनके दोस्तों ने मुकेश पर भरोसा नहीं छोड़ा था।
रफ़ी, किशोर और मुकेश — तीन आवाज़ें, तीन रास्ते
उस दौर में तीन आवाज़ें इंडस्ट्री पर राज करती थीं — मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार और मुकेश। तीनों की अपनी अलग पहचान थी। रफ़ी साहब को परफ़ेक्शन का दूसरा नाम माना जाता था, दिलीप कुमार के लिए ज़्यादातर वही गाते थे। किशोर दा की आवाज़ में एक शरारत थी, एक यॉडलिंग का जादू, जो देव आनंद पर जमकर बैठता था। और मुकेश — मुकेश की आवाज़ में एक दर्द था, एक ऐसी सादगी जो सीधे दिल में उतर जाती थी। लोग कहते थे कि रफ़ी परफ़ेक्ट थे, किशोर हैरतअंगेज़ थे, पर मुकेश वो दोस्त थे जो बार में बैठकर आपके लिए एक गाना गा दें, सिर्फ़ दोस्ती की ख़ातिर। यही फ़र्क़ था तीनों में, और यही वजह थी कि तीनों साथ-साथ चलते हुए भी कभी एक-दूसरे की जगह नहीं ले पाए।
इंडस्ट्री में कभी-कभी यह चर्चा भी होती थी कि इन तीनों गायकों के बीच अंदरूनी होड़ रहती थी — किसका गाना पहले रिकॉर्ड होगा, किसे बड़े संगीतकार की फ़िल्म मिलेगी। यह बात सार्वजनिक तौर पर कभी खुलकर स्वीकार नहीं की गई, पर उस दौर के कई साक्षात्कारों और लेखों में इसका ज़िक्र मिलता है कि तीनों गायकों के फ़ैन्स आपस में जमकर बहस करते थे, अख़बारों के पन्नों पर भी यह मुक़ाबला छपता रहता था। आधिकारिक तौर पर तीनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे, यह बात सब मानते हैं — पर उस दौर के फ़िल्मी हलकों में यह भी कहा जाता था कि हर कामयाब गायक अपने हिस्से के गाने बचाकर रखना चाहता था। यह इंसानी फ़ितरत है, कोई नई बात नहीं।
पर्दे के पीछे की एक तस्वीर — बंबई की चॉल से लेकर सुरों के शहंशाह तक
मुकेश के पांच बच्चे थे — रीता, नितिन, नलिनी, मोहनीश और नम्रता। बड़े दो बच्चों, रीता और नितिन ने वो तंगी के दिन बहुत क़रीब से देखे, जबकि बाकी तीन का बचपन थोड़ा आसान रहा क्योंकि तब तक हालात सुधर चुके थे। नितिन मुकेश ने अपने पिता के नक़्शे क़दम पर चलते हुए गायकी को अपनाया, पर यह राह उनके लिए आसान नहीं रही। नितिन ने खुलकर कहा है कि उम्र भर उनकी तुलना पिता से होती रही — जबकि उन्होंने कभी मुकेश की नक़ल करने की कोशिश ही नहीं की। जैसे किशोर कुमार एक ही थे, वैसे ही मुकेश भी एक ही थे — यह बात नितिन बार-बार दोहराते रहे हैं।
मुकेश और सरल ने अपनी शादी की तीसवीं सालगिरह 22 जुलाई 1976 को मनाई थी — यानी मुकेश के अमेरिका दौरे पर निकलने से सिर्फ़ चार दिन पहले। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह उनकी आख़िरी सालगिरह होगी।
डेट्रॉइट की वो रात, और वो आवाज़ जो हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई
27 अगस्त 1976 — अमेरिका के मिशिगन राज्य के डेट्रॉइट शहर में एक लाइव कॉन्सर्ट की तैयारी के बीच मुकेश को दिल का दौरा पड़ा। कहा जाता है कि यह उनका पांचवां हार्ट अटैक था। मात्र 53 साल की उम्र में वो आवाज़ हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई, जिसने तीन दशकों तक हिंदुस्तान के दर्द और मोहब्बत को सुरों में पिरोया था।
जब यह ख़बर बंबई फ़िल्म इंडस्ट्री तक पहुंची, तो कहा जाता है कि राज कपूर ने सिर्फ़ इतना कहा — "मैंने अपनी आवाज़ खो दी।" यह एक लाइन शायद उस रिश्ते की सबसे बड़ी गवाही है जो इन दोनों के बीच तीस साल तक चला। मुकेश और सरल ने अपनी शादी की तीसवीं सालगिरह मनाने के महज़ चार दिन बाद उनका अमेरिका जाना हुआ था, और वहीं उनकी ज़िंदगी की आख़िरी यात्रा साबित हुई।
सरल जी बाद के सालों में अक्सर अपने बच्चों से कहा करती थीं कि वो अगले जन्म में भी मुकेश को ही अपना जीवनसाथी चुनेंगी। एक ऐसा रिश्ता जो घर से भागकर, भूख हड़ताल करके, बरसात में घंटों खड़े रहकर हासिल किया गया था, वो सिर्फ़ तीस साल की गृहस्थी में सिमटकर नहीं रह गया — वो एक ऐसी मिसाल बन गया जिसका ज़िक्र आज भी पुरानी फ़िल्मी पत्रिकाओं और साक्षात्कारों में मिलता है।
और हां, एक इत्तेफ़ाक़ और है जो हमेशा से फ़िल्मी हलकों में चर्चा का विषय रहा है। हिंदुस्तानी संगीत के तीन सबसे बड़े नगीने — मुकेश, मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार — तीनों की मौत महज़ कुछ बरसों के फ़ासले में हुई। मुकेश 53 साल के थे जब वो गए, रफ़ी साहब 55 साल के थे 1980 में, और किशोर दा 58 साल के थे जब 1987 में उनका निधन हुआ। तीनों की मौत की वजह भी एक ही थी — दिल का दौरा। यह सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़ है, पर बड़ा अजीब इत्तेफ़ाक़ है। कभी-कभी सोचती हूं कि जिस आवाज़ में इतना दर्द भरा हो, क्या वो दर्द असल ज़िंदगी में भी दिल पर बोझ बनकर बैठ जाता होगा? जवाब किसी के पास नहीं है।
खैर, यह तो सबको पता है कि मुकेश की आवाज़ आज भी उतनी ही ताज़ा लगती है जितनी पचास साल पहले लगती थी। "कभी कभी मेरे दिल में" हो या "आवारा हूं", इनकी गूंज आज भी उसी शिद्दत से सुनी जाती है। सुरों का यह बादशाह चला गया, पर उसकी आवाज़ आज भी उसी चॉल की गलियों से लेकर बड़े-बड़े हॉल तक गूंजती रहती है — यही शायद असली शोहरत है, जो मौत के बाद भी फीकी नहीं पड़ती।