← सभी फ़ीड्स पर वापस जाएं
Buzz · Biodata

बिजनेस संभालने के लिए मजबूर किया गया, फिर भी रजित कपूर थिएटर के लिए क्यों अड़े रहे?

रेहान आहूजा 13 Jul 2026 6,101 views

#RajitKapoor #ByomkeshBakshi #ShyamBenegal #SurajKaSaatvaanGhoda #Gulaam #BollywoodBiodata #FilmiBiodata #NationalAward #ClassicBollywood #TheatreToFilm

बिजनेस संभालने के लिए मजबूर किया गया, फिर भी रजित कपूर थिएटर के लिए क्यों अड़े रहे?

घर वालों ने एनएसडी का सपना फड़वा दिया था, फिर भी एक नाटक ने उनकी पूरी ज़िंदगी बदल दी।

तस्वीर देखिए ज़रा — चेहरा जाना-पहचाना लगेगा, पर नाम शायद तुरंत याद न आए। ये हैं रजित कपूर। ब्योमकेश बख्शी के उस दौर को याद कीजिए जब रविवार की सुबहें इसी शो के इंतज़ार में गुज़रती थीं — वो मुख्य किरदार यही निभाते थे। "गुलाम" में आमिर खान के बड़े भाई जय के रोल में भी यही नज़र आए थे। आज, 27 August, रजित कपूर जी का जन्मदिन है। 1960 में अमृतसर में जन्मे रजित जी की कहानी उतनी सीधी नहीं जितनी उनके सधे हुए अभिनय से लगती है — इसमें पारिवारिक दबाव है, फाड़ा हुआ एक फॉर्म है, और एक नाटक है जिसने पूरी दिशा ही बदल दी।

डेढ़ साल की उम्र में मुंबई, और एक बिजनेसमैन पिता की उम्मीदें

रजित जी मात्र डेढ़ साल के थे जब उनका परिवार अमृतसर छोड़कर मुंबई आ बसा — वजह थी पिता का बिजनेस। अब जिस घर में पिता बिजनेसमैन हों, वहां बेटे से उम्मीद भी वैसी ही होती है — पढ़ो-लिखो, बिजनेस संभालो। पर रजित जी का मन तो बचपन से ही नाच-गाने और एक्टिंग की तरफ़ भागता था। कॉलेज तक आते-आते ये थिएटर में रम चुके थे। और फिर आया वो मोड़ जब इन्होंने थिएटर को गंभीरता से सीखने की ठानी — नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली। एनएसडी का फॉर्म खरीद लिया गया था। पर जब ये ख्वाहिश घरवालों के सामने रखी गई — घर में हाहाकार मच गया।

यहां एक पल ठहरकर सोचने वाली बात है। हर उस बच्चे की कहानी जो घरवालों की मर्ज़ी के खिलाफ अपना रास्ता चुनना चाहता है, उसमें यही टकराव कहीं न कहीं छुपा होता है। रजित जी के घरवालों की दलील भी वही पुरानी, पर पूरी तरह जायज़ थी — फिल्मों में ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं, जमा-जमाया बिजनेस उम्र भर साथ देगा। दबाव इतना बढ़ा कि रजित जी ने खुद अपने हाथों से एनएसडी का फॉर्म फाड़कर फेंक दिया, और बीकॉम में दाखिला ले लिया।

थिएटर का कीड़ा नहीं मरा — और वहीं से मिली किस्मत

फॉर्म फट गया, सपना नहीं। बीकॉम की पढ़ाई के दौरान भी रजित जी थिएटर करते रहे, जब भी वक़्त मिलता, स्टेज पर पहुंच जाते। उन्हीं दिनों उनका एक नाटक — "लव लैटर" — ख़ासा पसंद किया जाने लगा। और फिर एक दिन उस नाटक को देखने कोई और नहीं, ख़ुद श्याम बेनेगल पहुंच गए। बेनेगल साहब को रजित कपूर की एक्टिंग इतनी भा गई कि अगले ही दिन रजित जी के पास खबर पहुंची — श्याम बेनेगल उन्हें अपनी अगली फिल्म "सूरज का सातवां घोड़ा" में एक अहम किरदार के लिए साइन करना चाहते हैं।

सोचिए ज़रा — जिस बच्चे से फॉर्म फड़वाया गया था, थिएटर छुड़वाने की कोशिश हुई थी, वही बच्चा अपने पहले ही नाटक के दम पर एक दिग्गज फिल्मकार की नज़रों में चढ़ गया। रजित जी श्याम बेनेगल से मिलने उनके ऑफिस पहुंचे, स्क्रिप्ट पढ़ी — और तब जाकर एहसास हुआ कि ये कोई छोटा-मोटा किरदार नहीं, बल्कि लीड रोल है। ये लम्हा उनके लिए बेहद खुशी भरा था, ऐसा ख़ुद उन्होंने आगे चलकर बताया।

यहां एक दिलचस्प तथ्य ये भी है कि "सूरज का सातवां घोड़ा" भले ही रजित कपूर की पहली फिल्म रही हो, पर कैमरे के सामने अभिनय का तजुर्बा उन्हें इससे कहीं पहले ही मिल चुका था। कॉलेज के दिनों में ही वो "घर जमाई", "क्षितिज ये नहीं" और "युगांतर" जैसे टीवी शोज़ में काम कर चुके थे। यहां तक कि उनका सबसे लोकप्रिय शो "ब्योमकेश बक्शी" भी असल में "सूरज का सातवां घोड़ा" से पहले शूट हो चुका था — बस उसका टेलिकास्ट बाद में हुआ। यानी जिस शो को लोग उनकी पहचान मानते हैं, वो पर्दे पर आने से पहले ही कैमरे के सामने रिकॉर्ड हो चुका था।

श्याम बेनेगल के "परमानेंट एक्टर" बनने का सफ़र

"सूरज का सातवां घोड़ा" के बाद तो रजित कपूर मानो श्याम बेनेगल की फिल्मों का स्थायी हिस्सा ही बन गए। "मम्मो", "द मेकिंग ऑफ महात्मा", "सरदारी बेगम", "समर", "हरी-भरी", "ज़ुबैदा", "नेताजी सुभाषचंद्र बोस", "वेलकम टू सज्जनपुर", "वेलडन अब्बा" — ये फेहरिस्त लंबी है, और हर फिल्म में रजित जी ने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से जिया। इसके अलावा उन्होंने "ट्रेन टू पाकिस्तान", "गुलाम", "दत्तक", "सेंसर", "ज़िंदगी खूबसूरत है", "एक अलग मौसम", "रोक सको तो रोक लो", "मैंने गांधी को नहीं मारा", "गुलमोहर", "ये मेरा इंडिया", "मॉर्निंग वॉक", "मरेगा साला", "गुज़ारिश", "शैतान", "सिंह साहब दि ग्रेट", "किक", "रॉय", "राज़ी", "फिर से", "उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक", "रॉकेटरी: द नाम्बी इफेक्ट", "मिशन मजनू" और "मुजीब: द मेकिंग ऑफ ए नेशन" जैसी फिल्मों में भी अपनी छाप छोड़ी। इसी साल यानी 2024 में आई "छत्रपति संभाजी" में रजित कपूर औरंगज़ेब के किरदार में नज़र आए थे।

अवॉर्ड्स की बात करें तो "द मेकिंग ऑफ महात्मा" के लिए रजित कपूर को बेस्ट एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला था, जबकि मलयालम फिल्म "अग्निसाक्षी" के लिए उन्हें केरल स्टेट फिल्म बेस्ट एक्टर अवॉर्ड से नवाज़ा गया। इतने सालों में उन्होंने वेब सीरीज़ में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है — यानी बदलते दौर के साथ-साथ रजित जी ने भी खुद को ढाला, बिना अपनी जड़ों से कटे।

जब जेब खाली थी, पर काम करने का जज़्बा भरा था

एक इंटरव्यू में रजित जी ने अपनी ज़िंदगी के पहले बड़े खुशी के लम्हे के बारे में बताया था — वो था टीवी शो "घर जमाई" में उनका कास्ट होना। उस वक़्त उनकी उम्र थी सिर्फ़ 22 साल। और ये मौका इसलिए भी खास था क्योंकि उन्हें फ़रीदा जलाल और सतीश शाह जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। पर एक बात और भी थी जो इस लम्हे को यादगार बनाती है — उस दौर में रजित जी की जेब में ज़्यादा पैसे नहीं होते थे, पिता से बस पॉकेट मनी मिलती थी। उसी दौर में रजित कपूर जनक टोपरानी के पास स्टेज मैनेजर के तौर पर भी काम कर रहे थे, जहां से उन्हें कुछ अतिरिक्त पैसे मिल जाते थे।

अब ज़रा सोचिए — एक तरफ़ नेशनल अवॉर्ड विजेता अभिनेता, जिसने बड़े-बड़े फिल्मकारों के साथ काम किया, दूसरी तरफ़ वही इंसान अपने शुरुआती दिनों में स्टेज मैनेजरी करके गुज़ारा चलाता था। यही तो असली संघर्ष की कहानी होती है — न कोई शॉर्टकट, न कोई गॉडफादर, बस मेहनत और एक नाटक जिसने किस्मत के दरवाज़े खोल दिए। रजित कपूर की कहानी उन कलाकारों के लिए एक मिसाल है जो शोर मचाए बिना, चुपचाप अपने काम से अपनी जगह बनाते हैं — कोई विवाद नहीं, कोई स्कैंडल नहीं, बस दशकों की निरंतर, भरोसेमंद अदाकारी।