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पेट्रोमैक्स की एक चिंगारी ने छीन ली वो ज़िंदगी, जो कभी हीरो बनने का सपना लेकर आई थी!

रिधिमा कोहली 14 Jul 2026 9,215 views

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पेट्रोमैक्स की एक चिंगारी ने छीन ली वो ज़िंदगी, जो कभी हीरो बनने का सपना लेकर आई थी!

एक कलाकार जिसने पर्दे पर सैकड़ों बार खलनायकी निभाई, असल ज़िंदगी में उसकी मौत किसी भी विलेन से कहीं ज़्यादा क्रूर साबित हुई — आग की लपटों में, एक अंधेरे गांव के बीचोंबीच।

28 जनवरी 1933, जमशेदपुर के एक रईस व्यापारी परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया मनमोहन। पिता की गिनती शहर के जाने-माने कारोबारियों में होती थी, और घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। पर मनमोहन का दिल कहीं और लगा हुआ था — बचपन से ही उन्हें फ़िल्मों का जुनून था, और वो अपने तीनों भाइयों से बिल्कुल अलग सोच रखते थे। पिता का बिज़नेस संभालने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी, उन्हें बस एक ही सपना दिखता था — मुंबई के परदे पर हीरो बनकर उतरना।

1950 में मुंबई पहुंचे, हीरो नहीं बन पाए — मगर रास्ता बंद भी नहीं हुआ

1950 में मनमोहन इसी सपने के साथ मुंबई आ गए। कहा जाता है कि मुंबई पहुंचने से पहले ही उनकी मुलाक़ात मशहूर कॉमेडियन मुकरी और टुनटुन से जमशेदपुर के साकची इलाक़े के एक आम के बाग़ में हुई थी, जहां मनमोहन की मेहमाननवाज़ी से प्रभावित होकर दोनों कलाकारों ने उन्हें मुंबई तक साथ लाने और इंडस्ट्री से मिलवाने का फ़ैसला किया। मुंबई में मनमोहन की जान-पहचान शंकर-जयकिशन, भप्पी सोनी और जी.पी. सिप्पी जैसे नामों तक भी पहुंची। पर इतने अच्छे कॉन्टैक्ट्स होने के बावजूद उन्हें कोई पक्का रोल मिलने में बरसों लग गए — बीच में उन्होंने ख़ुद प्रोड्यूसर बनने की कोशिश भी की, "एक गुनाह और सही" नाम की एक फ़िल्म शुरू भी की, जिसमें जॉय मुखर्जी लीड में थे, ओ.पी. नैयर का संगीत था। मगर किसी अनजान वजह से यह फ़िल्म सिर्फ़ एक गाने की रिकॉर्डिंग के बाद ही रुक गई, और मनमोहन जो पैसा लेकर मुंबई आए थे, वो सब इसी कोशिश में डूब गया।

आख़िरकार 1963 में आई ये रास्ते हैं प्यार के मनमोहन की पहली रिलीज़ फ़िल्म बनी, जिसमें उन्हें एक बेहद छोटा सा रोल — एक वेंडर का किरदार — मिला। मुंबई आने से लेकर पहली फ़िल्म तक का यह सफ़र पूरे तेरह साल का रहा। इसके बाद भी संघर्ष थमा नहीं, पर 1965 में मनोज कुमार की फ़िल्म शहीद ने उनकी क़िस्मत बदल दी।

चंद्रशेखर आज़ाद का किरदार, और वो टाइपकास्ट जिसने हीरो बनने का सपना हमेशा के लिए दफ़्न कर दिया

शहीद में मनमोहन ने अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का किरदार निभाया था — यह फ़िल्म उनके पूरे करियर की सबसे यादगार कड़ी बन गई। इसके बाद उन्हें गुमनाम, आराधना, अमर प्रेम, आंधी, नमक हराम, उपकार जैसी क़रीब सौ फ़िल्मों में काम मिला। पर क़िस्मत ने अजीब करवट ली — जो लड़का हीरो बनने के सपने के साथ जमशेदपुर से मुंबई आया था, वो सपोर्टिंग और नेगेटिव किरदारों में टाइपकास्ट हो गया। आराधना में शर्मिला टैगोर पर हमला करने वाले किरदार ने तो उन्हें ऐसी छवि दे दी कि आगे चलकर वो लगातार रेप और खलनायकी वाले रोल में बुक होने लगे। हालांकि शहीद जैसी कुछ फ़िल्मों में उन्होंने सकारात्मक किरदार भी निभाए, पर परदे पर उनकी पहचान ज़्यादातर एक क्रूर, डरावने चेहरे की ही बनी रही। एक दौर तो ऐसा भी आया जब एक ही महीने में उनकी चौदह फ़िल्में रिलीज़ हुई थीं — यह उनके करियर के सुनहरे दिनों की गवाही है, भले ही परदे पर वो हमेशा "बुरे आदमी" ही क्यों न रहे हों।

कहा जाता है कि 1969 में फ़िल्म मन का मीत में मनमोहन को एक नेगेटिव रोल ऑफ़र किया गया था, पर डेट्स की दिक़्क़त की वजह से वो यह रोल नहीं कर पाए। उस वक्त उन्होंने ख़ुद सुनील दत्त को एक नए कलाकार का नाम सुझाया — विनोद खन्ना। यह वो दौर था जब विनोद खन्ना इंडस्ट्री में क़दम रख ही रहे थे, और मनमोहन की इस सिफ़ारिश ने उन्हें एक अहम मौक़ा दिलाया। सोचिए ज़रा — कितने सीनियर कलाकार होते हैं जो अपनी जगह किसी नए चेहरे को आगे बढ़ने का मौक़ा देते हैं? यह छोटी सी बात मनमोहन के स्वभाव की बड़ी गवाही है।

वो रात जब पेट्रोमैक्स ने सब कुछ बदल दिया

यह क़िस्सा है 1970 के दशक के आख़िरी सालों का। मनोज कुमार के साथ मनमोहन महाराष्ट्र के टिटवाला इलाक़े के पास, एक दूर-दराज़ जंगल में शूटिंग करने पहुंचे थे। वहां बिजली नाम की कोई चीज़ नहीं थी, तो पूरी यूनिट रात को रोशनी के लिए पेट्रोमैक्स लैंप का सहारा लेती थी। एक रात मनमोहन अपने रेशमी कुर्ते और लुंगी में, पेट्रोमैक्स के पास ही आराम कर रहे थे। तभी किसी ने लैंप को पंप किया, और वो अचानक फट गया।

आग की लपटें तुरंत मनमोहन के कपड़ों तक पहुंच गईं। रेशमी कपड़ा जिस तेज़ी से आग पकड़ता है, वो किसी को नहीं बख़्शता — मनमोहन का क़रीब अस्सी फ़ीसदी शरीर बुरी तरह झुलस गया। उन्हें फ़ौरन अस्पताल ले जाया गया, कई महीनों तक इलाज चला, सर्जरी हुई, डॉक्टरों ने बचाने की पूरी कोशिश की। कहते हैं कि इस हादसे के बाद वो लगभग एक साल तक किसी फ़िल्म में काम नहीं कर पाए, उनका शरीर धीरे-धीरे टूटता चला गया। आख़िरकार 26 अगस्त 1979 को, महज़ छियालीस साल की उम्र में, मनमोहन इस दुनिया को अलविदा कह गए। यह कितना क्रूर इत्तेफ़ाक़ है — जिस आदमी ने परदे पर इतनी बार दूसरों को तबाह होते दिखाया, उसकी अपनी ज़िंदगी एक चिंगारी की वजह से इतनी जल्दी बुझ गई।

बेटे ने संभाली विरासत, पर वो भी वक़्त से पहले चला गया

मनमोहन के बेटे नितिन मनमोहन ने भी फ़िल्म इंडस्ट्री में क़दम रखा, हालांकि पर्दे के आगे नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे — प्रोड्यूसर के तौर पर। 1986 में ज़ीनत अमान की फ़िल्म बात बन जाए से शुरुआत करने वाले नितिन ने आगे चलकर बोल राधा बोल, लाडला, चल मेरे भाई, आर्मी, शूल, यमला पगला दीवाना और रेडी जैसी बड़ी और कामयाब फ़िल्में बनाईं। उनके करियर में क़रीब तीन दशकों तक कई हिट फ़िल्में शामिल रहीं।

पर क़िस्मत ने इस परिवार के साथ एक और क्रूर मज़ाक़ किया। 29 दिसंबर 2022 को, महज़ बासठ साल की उम्र में नितिन मनमोहन का भी निधन हो गया। उन्हें 3 दिसंबर 2022 को दिल का दौरा पड़ा था, उसके बाद वो लगातार वेंटिलेटर पर रहे, और आख़िर में स्टेटस एपिलेप्टिकस — यानी दिमाग़ के असामान्य संकेतों की वजह से उनके शरीर के अहम अंगों ने काम करना बंद कर दिया। खैर, यह तो सबको पता है कि फ़िल्म इंडस्ट्री में कई परिवारों की कहानियां इतनी जल्दी ख़त्म हो जाती हैं कि सोचकर दिल भर आता है — बाप एक हादसे में गया, बेटा वक़्त से पहले बीमारी में। दोनों ने अपने-अपने तरीक़े से इस इंडस्ट्री को बहुत कुछ दिया, पर दोनों को वो लंबी उम्र नसीब नहीं हुई जिसके वो हक़दार थे।