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Buzz · Biodata

छठी फेल वो लड़का जो साइकिल पर कैसेट बांटता था, आज नेशनल अवॉर्ड्स की अलमारी भर चुका है!

आरव मलिक 14 Jul 2026 9,216 views

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छठी फेल वो लड़का जो साइकिल पर कैसेट बांटता था, आज नेशनल अवॉर्ड्स की अलमारी भर चुका है!

एक ऐसी कहानी जिसमें कोई फ़िल्मी घराना नहीं, कोई गॉडफ़ादर नहीं — बस एक लड़का था, एक साइकिल थी, और मुंबई की गलियों को क़रीब से देखने की एक आदत। आज उसी लड़के का जन्मदिन है।

26 अगस्त 1968, मुंबई के खार इलाक़े में एक बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम रखा गया मधुर भंडारकर। किसे पता था कि यह बच्चा छठी क्लास में फेल होकर स्कूल छोड़ देगा, और तीस साल बाद इसी लड़के की अलमारी में नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड्स की क़तार लगी होगी। मधुर भंडारकर की कहानी उन गिनी-चुनी कहानियों में से एक है जो सच में फ़र्श से अर्श तक की यात्रा है — बिना किसी शॉर्टकट के।

वो लड़का जो साइकिल पर बार गर्ल्स और अंडरवर्ल्ड तक पहुंचता था

पत्रकार रोंजिता कुलकर्णी को दिए एक पुराने इंटरव्यू में मधुर भंडारकर ने अपने बचपन की तंगी खुलकर बयां की थी। घर में पैसों की किल्लत थी, पढ़ाई में मन नहीं लगता था, और छठी क्लास में फेल होने के बाद उन्होंने स्कूल को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। इसके बाद शुरू हुआ वो दौर जिसने आगे चलकर उनकी पूरी फ़िल्ममेकिंग की नींव रखी — वो एक वीडियो पार्लर में काम करने लगे, जहां उनका काम था वीडियो कैसेट्स को साइकिल पर लादकर लोगों के घर पहुंचाना। यह सिलसिला चार-पांच साल तक चला, और इसी दौरान मधुर मुंबई के खार व बांद्रा जैसे इलाक़ों में एक्टर्स, बार गर्ल्स, अंडरवर्ल्ड के लोगों और बिज़नेसमैन तक पहुंचते रहे।

यह वो दौर था जब मधुर भंडारकर, बिना जाने-समझे, इंसानी फ़ितरत का सबसे बड़ा सबक़ सीख रहे थे। वो लोगों से बातें करते, उन्हें बारीकी से देखते, समझते कि पैसे और शोहरत के पीछे असली चेहरा कैसा दिखता है। उन्हीं दिनों जिन एक्टर्स के घर वो कैसेट डिलीवर करने जाते थे, उनमें मिथुन चक्रवर्ती एक ऐसे नाम थे जिन्होंने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बरसों बाद भी मधुर को पहचान लिया — याद रखा कि यही वो लड़का है जो कभी छोटी सी उम्र में उनके घर कैसेट पहुंचाने आता था। मधुर ख़ुद एक इंटरव्यू में बता चुके हैं कि मिथुन दा को यक़ीन ही नहीं होता था कि जो लड़का कभी हाफ़ पैंट पहनकर उनके घर आता था, वो आज इतना बड़ा नाम बन चुका है। सोचिए ज़रा — कितने लोग होंगे जिन्होंने अपने ही डिलीवरी बॉय को बरसों बाद पहचाना होगा? यही तो मिथुन दा की ख़ासियत रही है, ज़मीन से जुड़े रहने की।

रामगोपाल वर्मा का साया, और वो फ़्लॉप जिसने करियर ख़त्म होने की घोषणा करवा दी

वीडियो पार्लर के दिनों ने मधुर को फ़िल्मों की इतनी गहरी समझ दे दी थी कि लोग उन्हें सिनेमा का चलता-फिरता इनसाइक्लोपीडिया कहने लगे। इसी ज्ञान के दम पर उन्हें रामगोपाल वर्मा के असिस्टेंट के तौर पर काम मिला, जहां उन्होंने तीन-चार साल तक काम किया। इसी दौर में उन्हें रंगीला (1995) में एक छोटा सा कैमियो भी मिला, जहां वो असोसिएट डायरेक्टर स्टीवन कपूर के किरदार में नज़र आए थे। रंगीला की कामयाबी के बाद मधुर ने रामगोपाल वर्मा से अपना रास्ता अलग कर लिया, और अगले दो साल इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के तौर पर कोई फ़िल्म हासिल करने की जद्दोजहद में गुज़ार दिए।

यह वो दौर था जब मधुर प्रोड्यूसर्स को अपनी कहानियां सुनाते, तो जवाब मिलता कि यह तो श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी की स्टाइल जैसी बहुत आर्ट-हाउस टाइप कहानी है, यह चलेगी नहीं। उन्हें बार-बार यही सलाह मिलती कि पहले कोई कमर्शियल फ़िल्म बनाकर दिखाओ, कामयाब हो जाओगे तो मैसेज वाली फ़िल्म बाद में बना लेना। बेरोज़गारी और मजबूरी में मधुर ने वही रास्ता चुना — उन्होंने ख़ुद कहा है कि जब इंसान इनसिक्योर होता है, तो जो कोई भी उसे कुछ बताए, वो उसे मानने को तैयार हो जाता है। नतीजा निकला त्रिशक्ति — एक ऐसी फ़िल्म जिसमें उन्हें एक्शन डालने को कहा गया, हेलिकॉप्टर सीन डालने को कहा गया, आइटम नंबर और बिकिनी सीन्स तक ठूंसने को कहा गया। मधुर ने वैसा ही किया, हालांकि उन्हें ख़ुद अंदाज़ा था कि यह फ़िल्म कुछ खास नहीं करने वाली। 1999 में रिलीज़ हुई त्रिशक्ति बुरी तरह पिट गई, और इंडस्ट्री के कई लोगों ने खुलेआम मधुर भंडारकर का करियर ख़त्म घोषित कर दिया।

मधुर ने बरसों बाद एक इंटरव्यू में यह भी बताया कि त्रिशक्ति की नाकामी के बाद प्रोड्यूसर्स को मनाना कितना मुश्किल था। उन्होंने कहा कि चांदनी बार के लिए फ़ाइनेंसर ढूंढना बेहद कठिन साबित हुआ, क्योंकि वो एक फ़्लॉप डायरेक्टर के तौर पर जाने जाते थे। इसी दौर में अभिनेत्री तबू ने उन पर भरोसा जताया — मधुर के मुताबिक़ तबू ने बाद में मज़ाक़ में कई बार कहा कि मधुर भंडारकर उनकी खोज हैं, और उन्होंने ऐसी स्क्रिप्ट पर हामी भरी थी जिसे ठुकराना उनके लिए मुमकिन ही नहीं था। मधुर यह भी बताते हैं कि चांदनी बार की कहानी का बीज उनके मन में तब पड़ा जब वो रिसर्च के सिलसिले में मुंबई के अलग-अलग डांस बार गए, और वहां बजने वाला गाना "मुंगड़ा" व बार डांसर्स की ज़िंदगी उन्हें हमेशा के लिए झकझोर गई।

पार्टियों में मिली बेइज़्ज़ती, और वो सबक़ जो किताबों में नहीं मिलता

त्रिशक्ति की नाकामी के बाद मधुर एक बार फिर मुश्किलों से घिर गए। इस बार उन्होंने रणनीति बदली — बड़े स्टार्स के सेक्रेट्ररीज़ से जान-पहचान बनानी शुरू की, ताकि उन्हें फ़िल्मी पार्टीज़ में बुलावा मिल सके। मधुर को तब तक यह समझ आ चुका था कि इस इंडस्ट्री में कॉन्टैक्ट्स के बिना कुछ नहीं होता, और जो दिखता है वही बिकता है। इन पार्टियों में मधुर को कई बार बेइज़्ज़ती जैसा महसूस भी हुआ — कई एक्टर्स से उन्होंने बात करने की कोशिश की, तो जवाब में सिर्फ़ एक "हैलो" मिला और मुंह दूसरी तरफ़ घूम गया। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कुछ वही एक्टर्स आगे चलकर बड़ी ख़ुशी से मधुर की फ़िल्मों का हिस्सा बने — यही तो इस इंडस्ट्री का असली चेहरा है, जहां आज का बेगाना कल का साथी बन जाता है, और कल का दोस्त परसों अजनबी।

मधुर ख़ुद कहते हैं कि उन्हीं पार्टियों में जाकर उन्हें इस इंडस्ट्री का असली खेल समझ आया — यहां बेहद प्रैक्टिकल होना पड़ता है, क्योंकि यहां हर इतवार को दोस्त और दुश्मन बदलते रहते हैं। इस इंडस्ट्री पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह बात शायद कड़वी लगे, पर जिसने भी यह दुनिया क़रीब से देखी है, वो जानता है कि इसमें कितनी सच्चाई है।

चांदनी बार से जो शुरुआत हुई, वो कहां तक पहुंची

2001 में मधुर को आख़िरकार वो मौक़ा मिला जिसका इंतज़ार था — चांदनी बार। यह फ़िल्म उन्होंने दिल से बनाई, तबू और अतुल कुलकर्णी को लेकर, महज़ डेढ़ करोड़ रुपए के बजट में। फ़िल्म रिलीज़ होते ही सब कुछ बदल गया — मधुर की ज़िंदगी रातों-रात फ़र्श से अर्श पर पहुंच गई। चांदनी बार ने नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड फ़ॉर बेस्ट फ़िल्म ऑन सोशल इशूज़ जीता, और इसके बाद मधुर ने जो सिलसिला शुरू किया, वो थमा नहीं — सत्ता, आन, पेज थ्री, कॉरपोरेट, ट्रैफ़िक सिग्नल, फ़ैशन, जेल, हीरोइन जैसी बहुचर्चित फ़िल्में एक के बाद एक आती रहीं। पेज थ्री के लिए उन्हें नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड फ़ॉर बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म मिला, जबकि ट्रैफ़िक सिग्नल के लिए उन्हें ख़ुद बेस्ट डायरेक्शन का नेशनल अवॉर्ड मिला — वो अवॉर्ड जो किसी डायरेक्टर के करियर का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है। बाद में फ़ैशन फ़िल्म को भी प्रियंका चोपड़ा और कंगना रनौत के अभिनय के लिए नेशनल अवॉर्ड्स मिले। 2016 में मधुर भंडारकर को पद्मश्री से भी नवाज़ा गया।

खैर, यह तो सबको पता है कि आज मधुर भंडारकर इंडस्ट्री के सबसे कामयाब और सम्मानित डायरेक्टर्स में गिने जाते हैं। पर जब भी उनकी कहानी सुनो, वो साइकिल वाला लड़का याद आ जाता है जो कभी बार गर्ल्स और अंडरवर्ल्ड के दरवाज़ों तक कैसेट पहुंचाया करता था। शायद यही वो नज़रिया है जिसने आगे चलकर उन्हें समाज के उन कोनों की कहानियां दिखाने की हिम्मत दी, जिन्हें बाक़ी डायरेक्टर छूने से भी कतराते थे।