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संजीव कुमार की मौत की खबर सुनकर वो चाय पार्टी बीच में ही छोड़कर रो पड़े थे उस्ताद, ये थी उनकी असली कहानी!

ईशा सक्सेना 14 Jul 2026 9,214 views

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संजीव कुमार की मौत की खबर सुनकर वो चाय पार्टी बीच में ही छोड़कर रो पड़े थे उस्ताद, ये थी उनकी असली कहानी!

एक शाम, एक चाय पार्टी, और अचानक आई एक ख़बर जिसने पूरे कमरे की रौनक़ छीन ली — यह क़िस्सा है एक उस्ताद और उसके सबसे चहेते शागिर्द के बीच के रिश्ते का, जो मौत के बाद भी उतना ही गहरा साबित हुआ।

6 नवंबर 1985 की बात है। ए.के. हंगल साहब उस दिन लखनऊ में थे, अपने एक पुराने दोस्त के बुलावे पर — एक आर्मी अफ़सर जो बांग्लादेश को पाकिस्तान से आज़ाद कराने की लड़ाई में भारतीय सेना की तरफ़ से अहम भूमिका निभा चुके थे। उनके सम्मान में एक बढ़िया सी चाय पार्टी रखी गई थी, लखनऊ की कई बड़ी हस्तियां वहां जमा थीं। पार्टी अभी शुरू ही हुई थी कि किसी ने हंगल साहब के कान में धीरे से कहा — "संजीव कुमार नहीं रहे।"

वो रात जब हंगल साहब खाना भी नहीं खा पाए

पहले तो हंगल साहब को यक़ीन ही नहीं हुआ। उन्होंने फ़ौरन मुंबई में अपने किसी परिचित को फ़ोन लगाकर तस्दीक़ करनी चाही। ख़बर सच निकली — संजीव कुमार इस दुनिया को छोड़ चुके थे। हंगल साहब की आंखें भर आईं, वो सबके सामने रो पड़े, और बहुत देर तक रोते रहे। वो सीधे अपने आर्मी अफ़सर दोस्त के घर से अपने होटल लौट आए, उस रात उनसे खाना तक नहीं खाया गया। अगले दिन उनकी शूटिंग तय थी, पर हंगल साहब ने शूटिंग करने से साफ़ इनकार कर दिया — इतना गहरा सदमा था उन्हें।

संजीव कुमार कभी हंगल साहब के शागिर्द हुआ करते थे। हंगल साहब ने ही उन्हें अपने एक नाटक में पहली बार अभिनय करने का मौक़ा दिया था — एक बूढ़े आदमी का किरदार। संजीव कुमार को यह किरदार पसंद नहीं आया था, उन्होंने पूछा था कि उन्हें बूढ़े का रोल क्यों दिया जा रहा है, वो तो हीरो बनना चाहते हैं। हंगल साहब ने तब जो जवाब दिया, वो आज भी याद रखने लायक़ है — हीरो तो कोई भी बन जाता है, असली मज़ा तब है जब तुम हीरो नहीं, एक अभिनेता बनो, और अगर एक अच्छे अभिनेता बन गए, तो हीरो बनने से तुम्हें कोई नहीं रोक सकता।

यह बात आगे चलकर बिल्कुल सच साबित हुई — संजीव कुमार एक शानदार अभिनेता भी बने और हीरो भी। ख़ुद संजीव कुमार अपनी कामयाबी का श्रेय हमेशा हंगल साहब को दिया करते थे। एक बार तबस्सुम जी के मशहूर शो "फूल खिले हैं गुलशन गुलशन" में उन्होंने खुलकर कहा था कि वो जो कुछ भी बने, हंगल साहब की वजह से बने। इत्तेफ़ाक़ से वो इंटरव्यू ख़ुद हंगल साहब ने भी देखा था, और उस दिन वो बहुत ख़ुश हुए थे — एक उस्ताद के लिए इससे बड़ी दौलत और क्या हो सकती है कि उसका शागिर्द दुनिया के सामने उसका नाम ले।

आज़ादी की लड़ाई से लेकर सुई-धागे तक — हंगल साहब का असली सफ़र

आज ए.के. हंगल साहब की पुण्यतिथि है — 26 अगस्त 2012 को वो इस दुनिया से रुख़सत हो गए थे, अट्ठानवे साल की उम्र में। पर हंगल साहब की अपनी कहानी संजीव कुमार से जुड़े इस क़िस्से से कहीं ज़्यादा बड़ी और शानदार है। सियालकोट (अब पाकिस्तान) में जन्मे हंगल साहब एक स्वतंत्रता सेनानी थे — 1929 से 1947 तक आज़ादी की लड़ाई का हिस्सा रहे, जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के विरोध में छात्र आंदोलनों में शामिल हुए, और अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने की सज़ा में कराची में तीन साल जेल में भी काटे। पेशावर में उनका बचपन गुज़रा, जहां उनके पिता की सरकारी नौकरी थी। रोज़ी-रोटी के लिए उन्होंने लंबे समय तक दर्ज़ी यानी टेलरिंग का काम भी किया। बंटवारे का दंश भी उन्होंने झेला — पाकिस्तान से जेल काटकर निकलने के बाद वो भारत आए, और आख़िरकार मुंबई पहुंचे, जहां बलराज साहनी और कैफ़ी आज़मी जैसे नामों के साथ इप्टा (IPTA) से जुड़कर रंगमंच में सक्रिय हुए। फ़िल्मों में उनकी एंट्री उस उम्र में हुई जब आम तौर पर लोग रिटायर होने की सोचते हैं — तिरपन साल की उम्र में उन्होंने अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया, और आगे चलकर शोले के इमाम साहब, नमक हराम के बिपिनलाल पांडे और आंधी के बृंदा काका जैसे किरदारों से घर-घर में पहचाने जाने लगे।

हंगल साहब का जीवन विवादों से भी अछूता नहीं रहा। 1993 में जब उन्होंने अपनी जन्मभूमि पाकिस्तान जाने के लिए वीज़ा के लिए आवेदन किया और मुंबई स्थित पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावास के पाकिस्तान डे समारोह में शिरकत की, तो शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे ने उन्हें खुलेआम "ग़द्दार" तक कह डाला। उनके पुतले जलाए गए, उनकी फ़िल्मों के बहिष्कार का ऐलान किया गया, और कई फ़िल्मों से उनके सीन तक काट दिए गए। पर हंगल साहब कभी झुके नहीं — 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान जब शिवसेना ने उनसे पाकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान "निशान-ए-पाकिस्तान" वापस करने को कहा, तब भी उन्होंने यह मानने से इनकार कर दिया।

खैर, यह तो सबको पता है कि हंगल साहब आख़िरी सालों में बेहद तंगी में गुज़ार रहे थे, और इंडस्ट्री के कई सितारों ने उनकी मदद के लिए आगे आना ज़रूरी भी नहीं समझा। पर जिस दिन उनका अंतिम संस्कार हुआ, उस दिन भी बॉलीवुड के बड़े नाम नदारद रहे — यह बात उस दौर में ख़ूब चर्चा में रही थी। एक इंसान जिसने अपनी पूरी जवानी देश की आज़ादी को दी, जो कभी झुका नहीं, जिसने संजीव कुमार जैसे कलाकार को गढ़ा — उसकी विदाई इतनी ख़ामोश रही, यह बात सोचकर आज भी दिल भारी हो जाता है।