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Buzz · Biodata

पृथ्वीराज कपूर की आवाज़ चली गई तो किसने डब की थी उनकी डायलॉग्स?

कियारा खुराना 13 Jul 2026 6,101 views

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पृथ्वीराज कपूर की आवाज़ चली गई तो किसने डब की थी उनकी डायलॉग्स?

एक भूला-बिसरा चेहरा, जिसने चुपचाप बड़े-बड़े सितारों के संकट में काम आकर अपनी जगह बनाई थी।

बैजू बावरा में बादशाह अकबर का वो रोबीला किरदार याद है? या जागृति, भाभी, ममता जैसी फिल्मों में नज़र आया वो चेहरा जो हर बार अलग अंदाज़ में दिखता था, पर पहचान में आ ही जाता था? नाम है — बिपिन गुप्ता। 1930 से 1960 के दशक तक हिंदी और बंगाली सिनेमा में एक भरोसेमंद चरित्र अभिनेता की हैसियत से पहचाने जाने वाले बिपिन गुप्ता जी का आज जन्मदिन है। 27 August 1905 को मेरठ में एक बंगाली परिवार में जन्मे बिपिन गुप्ता, पिता त्रैलोक्य नाथ गुप्ता और माता खेमनकरी गुप्ता की पांचवीं संतान थे। बचपन में ही परिवार बैरकपुर, बंगाल जाकर बस गया था, और वहीं गवर्नमेंट हाईस्कूल से इनकी पढ़ाई हुई।

रेडियो की नौकरी से थिएटर तक, फिर पहली और आखिरी बार हीरो बनने तक

कहा जाता है कि साल 1934 में बिपिन गुप्ता रेडियो में नौकरी करने लगे थे। यहीं से उनकी पहचान कुछ थिएटर कलाकारों से हुई, और यहीं से एक नए सफ़र की शुरुआत भी हुई। उसी साल यानी 1934 में आई मुस्लिम सोशल ड्रामा फिल्म "नूरी" में बिपिन गुप्ता जी ने पहली बार अभिनय किया — और दिलचस्प बात ये है कि यही एकमात्र फिल्म रही जिसमें वो हीरो बने। "नूरी" के डायरेक्टर योगेश चौधरी उनके लुक्स, आवाज़ और पर्सनैलिटी से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्हें सीधे लीड रोल में उतार दिया। इसके बाद 1936 तक आते-आते बिपिन गुप्ता एक प्रोफेशनल थिएटर कलाकार बन चुके थे, और 1938 में सोतू सेन निर्देशित चर्चित बंगाली फिल्म "चोखेर बाली" में उन्होंने अपनी पहली बंगाली फिल्म में बेहतरीन काम किया।

यहां एक बात और बताना ज़रूरी है — बिपिन गुप्ता जी शुरू से ही अभिनेता बनना चाहते थे, पर मुंबई आने के शुरुआती दिनों में गुज़ारे के लिए इन्हें कपड़ा व्यापारी के तौर पर भी काम करना पड़ा था। यानी संघर्ष का वो दौर, जो लगभग हर उस कलाकार की कहानी में मिलता है जो बाहर से आकर फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाना चाहता है, बिपिन गुप्ता जी की ज़िंदगी में भी मौजूद था।

चरित्र अभिनेता के तौर पर वो लंबी, भरोसेमंद पारी

1930, 40 और 50 के दशक की कई हिंदी और बंगाली फिल्मों में बिपिन गुप्ता जी ने चरित्र किरदार निभाए — "जवानी की रीत" (1939), "निमाई सन्यासी" (1940), "ब्याबधन" (1941), "प्रभू का घर" (1945), "पुजारी" (1946), "एक-शो-नोई दोबारा" (1950) और "राजा हरीशचंद्र" जैसी फिल्में इसकी मिसाल हैं। पर उनकी सबसे यादगार भूमिका आई 1952 में, कल्ट क्लासिक "बैजू बावरा" में, जहां उन्होंने बादशाह अकबर का किरदार निभाया। इस फिल्म की ज़बरदस्त कामयाबी का फ़ायदा बिपिन गुप्ता जी को भी खूब मिला।

साल 1968 में आई फिल्म "तीन बहुरानियां" में पृथ्वीराज कपूर जी ने एक अहम किरदार निभाया था। पर उस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही पृथ्वीराज कपूर जी बीमार पड़ गए, और कुछ वक़्त के लिए उनकी आवाज़ ही गायब हो गई। ऐसे नाज़ुक हालात में प्रोडक्शन को एक हल निकालना था — और वो हल था बिपिन गुप्ता जी। उनसे ही पृथ्वीराज कपूर जी के सारे डायलॉग्स डब कराए गए। सोचिए ज़रा, कितना भरोसा रहा होगा किसी अभिनेता की आवाज़ और अंदाज़ पर, कि इतने बड़े सितारे के डायलॉग्स उसी की आवाज़ में डब कराए जाएं।

यही तो असली फ़िल्म इंडस्ट्री की तस्वीर है — जहां पर्दे के पीछे ऐसे कलाकार होते हैं जिनकी वजह से बड़े सितारों का काम भी बिना रुके आगे बढ़ता रहता है, पर उनका नाम अक्सर हेडलाइन नहीं बनता।

प्रोड्यूसर बनने की कोशिश — "दाल में काला" वाला किस्सा

साल 1964 में बिपिन गुप्ता जी ने ख़ुद एक फिल्म प्रोड्यूस करने का फ़ैसला किया — नाम था "दाल में काला"। इस फिल्म को सत्येन बोस जी ने डायरेक्ट किया था, और इसमें हीरो थे किशोर कुमार और हीरोइन थीं निम्मी। पर ये प्रोजेक्ट आसान नहीं रहा — फिल्म को पूरा होने में पूरे चार साल लग गए। और जब फिल्म आई तो कहानी के तौर पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई। हां, इसके गाने ज़रूर पसंद किए गए, जिन्हें सी. रामचंद्र जी ने कंपोज़ किया था।

खैर, ये तो हर फिल्ममेकर के साथ होता है — कभी-कभी मेहनत और वक़्त लगाने के बावजूद फिल्म वो कमाल नहीं दिखा पाती जिसकी उम्मीद होती है। पर गानों का चलना भी किसी प्रोजेक्ट को पूरी तरह बेकार जाने से बचा लेता है।

निजी ज़िंदगी — धुंधली तस्वीर, पर कुछ कड़ियां साफ़

बिपिन गुप्ता जी की निजी ज़िंदगी को लेकर बहुत ज़्यादा जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। जो जानकारी मिलती है उसके मुताबिक उनकी शादी अन्नपूर्णा देवी नाम की महिला से हुई थी। उनका एक बेटा था, जिसका नाम सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट नहीं मिलता। उनके बेटे ने एक्टर-म्यूज़िक डायरेक्टर शैलेश मुखर्जी की बेटी कजरी से शादी की थी, और कहा जाता है कि बिपिन गुप्ता जी की बहू कजरी भी एक अभिनेत्री थीं।

09 September 1981 को कोलकाता में बिपिन गुप्ता जी का निधन हो गया। एक लंबी, स्थिर, भरोसेमंद पारी खेलने वाला ये अभिनेता आज शायद उतना याद नहीं किया जाता जितना किया जाना चाहिए — पर सिनेमा के इतिहास में उनका योगदान मिटाया नहीं जा सकता।

एक आखिरी बात भी बता दूं। इंटरनेट पर कई जगहों पर बिपिन गुप्ता जी की जन्मतिथि 21 August बताई गई है, क्योंकि विकीपीडिया पर यही दर्ज है, और ज़्यादातर लोग विकीपीडिया को ही सच मान लेते हैं। पर विकीपीडिया कई बार गलत भी होता है। सिनेमाज़ी जैसे सिनेमा-केंद्रित स्रोतों पर बिपिन गुप्ता जी की जन्मतिथि 27 August ही दर्ज है, और सिनेमाई जानकारियों के मामले में ये स्रोत विकीपीडिया से कहीं ज़्यादा भरोसेमंद माना जाता है। तो सही तारीख यही मानी जानी चाहिए — 27 August।