इक़बाल ने बिन बोले जो कहा, वो नो एंट्री का शोर भी नहीं दबा पाया?
बीस साल पहले एक ही दिन दो बिल्कुल अलग फ़िल्में रिलीज़ हुई थीं — एक शोर-शराबे वाली कॉमेडी, दूसरी एक गूंगे-बहरे लड़के की ख़ामोश ज़िद की कहानी। किसे किसने पीछे छोड़ा, यह जानना दिलचस्प है।
26 अगस्त 2005 — सिनेमाघरों के बाहर उस दिन दो पोस्टर एक साथ टंगे थे। एक तरफ़ अनीस बज़मी की No Entry, जिसमें सलमान ख़ान, अनिल कपूर और फ़रदीन ख़ान की तिकड़ी थी, बीस करोड़ का बजट, हर तरफ़ प्रोमोशन का शोर। दूसरी तरफ़, बिना किसी बड़े स्टार के, नागेश कुकनूर की एक छोटी सी फ़िल्म — इक़बाल। जिस दिन मल्टीप्लेक्स के बाहर No Entry के पोस्टर पर सलमान की मसल्स चमक रही थीं, उसी स्क्रीन के बगल वाले हॉल में एक अनजान चेहरे वाला लड़का, श्रेयस तलपदे, गांव की मिट्टी में गेंद फेंकने की प्रैक्टिस कर रहा था। दोनों फ़िल्में एक ही तारीख़ को टकराईं, और नतीजा वो नहीं निकला जो कोई अंदाज़ा लगा सकता था।
दो करोड़ पचीस लाख की फ़िल्म, और वो लड़का जिसने कभी हीरो बनने का सपना तक नहीं देखा था
इक़बाल का बजट था करीब दो करोड़ पच्चीस लाख रुपए — उस दौर की स्टार-स्टडेड फ़िल्मों के मुकाबले यह रकम मामूली सी लगती है। यह फ़िल्म बनी सुभाष घई की मुक्ता सर्चलाइट के बैनर तले, डायरेक्शन नागेश कुकनूर का था, जो टीन दीवारें और डोर जैसी सधी हुई फ़िल्में बना चुके थे। बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म ने घरेलू स्तर पर क़रीब साढ़े पांच करोड़ रुपए कमाए — यानी बजट के हिसाब से यह फ़िल्म मुनाफ़े में रही, भले ही यह उस साल की सबसे बड़ी हिट फ़िल्मों में शुमार नहीं हुई। इसे उस दौर के ट्रेड सर्कल में "एवरेज" वर्डिक्ट दिया गया था, पर इसकी असली कमाई पैसों में नहीं, तारीफ़ों और अवॉर्ड्स में हुई।
इस फ़िल्म ने श्रेयस तलपदे को बतौर लीड हीरो पहला मौक़ा दिया। इससे पहले श्रेयस मराठी थिएटर और टीवी में सक्रिय थे, और हिंदी सिनेमा में उन्होंने निदान व आंखें जैसी फ़िल्मों में बहुत छोटे-छोटे रोल किए थे — ऐसे रोल जिन पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो। इक़बाल उनके लिए वो मौक़ा साबित हुई जिसने पूरी दिशा बदल दी। श्रेयस ख़ुद बरसों बाद एक इंटरव्यू में कह चुके हैं कि इस फ़िल्म ने उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल दी — आज वो जो कुछ भी हैं, उसकी बुनियाद यही फ़िल्म है। यह बात इसलिए भी मानी जा सकती है क्योंकि इसके बाद डोर, गोलमाल जैसी फ़िल्मों ने उन्हें असली पहचान दी, पर शुरुआत यहीं से हुई थी।
क्रिकेटर की कहानी, या असल में किसी और की?
फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले और उसके बाद भी बरसों तक एक चर्चा फ़िल्मी हलकों और क्रिकेट फ़ैन्स के बीच चलती रही — कहा जाता है कि लोग यह मानने लगे थे कि इक़बाल की कहानी क्रिकेटर इरफ़ान पठान की ज़िंदगी से प्रेरित है। यह क़यास ख़ासकर फ़िल्म की रिलीज़ से ठीक पहले प्रोमो देखकर लगाया गया था, जब दर्शकों को लगा कि एक ग़रीब घर से निकला तेज़ गेंदबाज़ बनने का सपना देखने वाला लड़का, कहीं न कहीं इरफ़ान की ही कहानी दोहरा रहा है। मगर आधिकारिक तौर पर नागेश कुकनूर और सुभाष घई की तरफ़ से यह साफ़ किया गया कि फ़िल्म का इरफ़ान पठान से कोई सीधा संबंध नहीं है — यह सिर्फ़ एक क़यास था, हक़ीक़त नहीं।
असल कहानी इससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प निकली, और उतनी ही तकलीफ़देह भी। कहा जाता है — और इस दावे को टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे अख़बार ने भी उठाया था — कि इक़बाल की असली प्रेरणा यशवंत "बाबा पैंथर" सिधये नाम के एक भूले-बिसरे क्रिकेटर थे, जो हिंदुस्तान के पहले गूंगे-बहरे रणजी क्रिकेटर माने जाते हैं। सिधये पुणे से थे, 1952 से 1968 तक महाराष्ट्र, मुंबई और रेलवे के लिए रणजी ट्रॉफ़ी खेले, और अपनी फ़ुर्ती की वजह से "पैंथर" कहलाते थे। कहते हैं कि उन्होंने एक मैच में मरीन लाइन्स के पीजे हिंदू जिमखाना मैदान से छक्का ऐसा जड़ा था कि गेंद सीधे अरब सागर में जा गिरी — यह रिकॉर्ड आज तक किसी ने नहीं तोड़ा। पर बाबा सिधये को न फ़िल्म में क्रेडिट मिला, न उनके परिवार को कभी कोई मान्यता। यह विवाद बरसों बाद, फ़िल्म की कामयाबी के काफ़ी अरसे बाद, अख़बारों में उठा — और आज भी इसका ठीक-ठीक जवाब किसी के पास नहीं है कि कुकनूर ने असल में किससे प्रेरणा ली थी। ख़ुद कुकनूर ने इस बारे में यही कहा है कि यह कहानी कई असल क्रिकेटरों से मिलकर बनी थी, किसी एक जीवनी पर आधारित नहीं थी।
श्रेयस तलपदे ने एक इंटरव्यू में एक मज़ेदार क़िस्सा साझा किया था, जो सेट के पीछे की असली राजनीति और मासूमियत दोनों दिखाता है। शूटिंग शुरू होने से पहले नागेश कुकनूर ने श्रेयस को आगाह किया कि नसीरुद्दीन शाह थोड़े मूडी हैं, अगर कोई दिक़्क़त हो तो सीधे उनके पास आना। उसी रात नसीर साहब ख़ुद श्रेयस के पास आए और कहा — नागेश थोड़े मूडी हैं, कोई दिक़्क़त हो तो मेरे पास आना। श्रेयस ने दोनों की बात मान ली, पर किसी को यह नहीं बताया कि दूसरे ने भी यही कहा है। यह छोटा सा क़िस्सा बताता है कि कैसे एक नए एक्टर को दो बड़े नामों के बीच अपना रास्ता ख़ुद तलाशना पड़ता है, बिना किसी की तरफ़दारी किए।
नसीर साहब की चुप्पी, और वो अवॉर्ड जो सबसे ऊंचा साबित हुआ
इक़बाल में नसीरुद्दीन शाह ने मोहित मिश्रा का किरदार निभाया था — एक शराबी, टूटा हुआ पूर्व रणजी क्रिकेटर, जो इक़बाल को कोचिंग देता है। इस रोल के लिए नसीर साहब को 53वें नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड्स में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का सम्मान मिला — उनके करियर का तीसरा नेशनल अवॉर्ड, इससे पहले वो स्पर्श और पार के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड जीत चुके थे। यह दिलचस्प है कि फ़िल्म को ख़ुद भी नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड फ़ॉर बेस्ट फ़िल्म ऑन अदर सोशल इशूज़ की कैटेगरी में सम्मानित किया गया — यानी सरकारी जूरी ने भी माना कि यह फ़िल्म सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, एक ज़रूरी सामाजिक बयान भी थी।
वहीं फ़िल्मफ़ेयर की तरफ़ से नसीर साहब को इसी फ़िल्म के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर की कैटेगरी में नामांकन मिला था, हालांकि यह अवॉर्ड उनके हाथ नहीं लगा। ग़ौर करने वाली बात यह है कि नसीर साहब जैसे दिग्गज कलाकार के लिए, जिनके पास पहले से तीन फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड्स थे — आक्रोश, चक्र और मासूम के लिए — एक सपोर्टिंग रोल की नॉमिनेशन शायद कोई बड़ी बात न लगे, पर उनके करीबी बताते हैं कि उन्हें यह किरदार निभाने में एक अलग ही सुकून मिला था, क्योंकि यह किरदार असल ज़िंदगी की तरह उलझा हुआ था — न पूरी तरह हीरो, न पूरी तरह विलेन।
कपिल देव का वो कैमियो, और वो छह भैंसे जिन्हें सब भूल गए
फ़िल्म में एक और दिलचस्प चीज़ थी — पूर्व क्रिकेट कप्तान कपिल देव की एक स्पेशल अपीयरेंस। कपिल पाजी ख़ुद के किरदार में नज़र आए थे, और इस कैमियो को लेकर उस दौर के दर्शकों में मिली-जुली राय रही। कुछ समीक्षकों ने इसे फ़िल्म से जोड़ा हुआ महसूस नहीं किया — एक अंग्रेज़ी समीक्षा में तो यहां तक लिखा गया कि कपिल का अभिनय बहुत सहज नहीं लगा और उनकी मौजूदगी कहानी में कुछ खास नहीं जोड़ पाई। बहरहाल, कपिल की मौजूदगी ने फ़िल्म को क्रिकेट जगत के करीब और लाने का काम किया, और प्रचार के लिहाज़ से यह एक चतुर चाल साबित हुई।
फ़िल्म की एक और अनकही बात यह भी है — इक़बाल के गांव के दृश्यों में इस्तेमाल हुई छह भैंसें, जिन्हें फ़िल्म के कई समीक्षकों ने "बेहतरीन सपोर्टिंग कास्ट" कहकर मज़ाक़ में सराहा था। कुकनूर की मिनिमलिस्ट स्टाइल में गांव का माहौल इतना असली लगता था कि दर्शकों को यह भूलना मुश्किल हो जाता था कि वो एक स्क्रिप्टेड फ़िल्म देख रहे हैं, न कि किसी असली गांव की डॉक्यूमेंट्री।
बीस साल बाद भी वो सपना ज़िंदा है
अगस्त 2025 में, फ़िल्म के बीस साल पूरे होने पर श्रेयस तलपदे ने ख़ुद इंस्टाग्राम पर पुरानी तस्वीरें साझा करते हुए इस सफ़र को याद किया था। यह महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं कि आज, ठीक इसके पांच साल बाद भी, यह फ़िल्म पैरेंट्स के बीच उतनी ही लोकप्रिय है जितनी बीस साल पहले थी — कई मां-बाप आज भी अपने बच्चों को यह फ़िल्म दिखाते हैं, ताकि उन्हें मेहनत और ज़िद की असली ताक़त समझ आए। सोचकर देखिए — कितनी फ़िल्में हैं जो बीस साल बाद भी पैरेंटिंग की गाइड बन जाती हैं?
खैर, यह तो सबको पता है कि उस दिन No Entry ने बॉक्स ऑफ़िस पर तूफ़ान मचाया था — क़रीब चौहत्तर करोड़ की कमाई के साथ यह 2005 की सबसे बड़ी हिट फ़िल्मों में गिनी गई। पर इक़बाल ने जो जगह बनाई, वो पैसों से नहीं नापी जा सकती। एक ऐसी फ़िल्म जिसमें कोई बड़ा स्टार नहीं था, जिसका हीरो बोल तक नहीं सकता था, उसने अवॉर्ड्स की टेबल पर उन फ़िल्मों को भी पीछे छोड़ दिया जो करोड़ों के प्रचार-प्रसार के साथ आई थीं। यही तो असली कमाल है — किसे पता था कि जिस दिन सलमान ख़ान का जलवा पूरे शहर में छाया था, उसी दिन एक गूंगे-बहरे लड़के की कहानी इतिहास में अपनी जगह बना रही थी।