पांच रुपए की कृष्ण मूर्ति ने बदल दी उस शायर की क़िस्मत, जिसने अठारह साल तक सिर्फ़ संघर्ष देखा!
एक शायर जिसने सिर्फ़ एक गीत लिखकर पूरे हिंदुस्तान का दिल जीत लिया था, फिर भी उसे अठारह साल तक गुमनामी में गुज़ारने पड़े — यह कहानी उतनी ही अध्यात्म की है, जितनी संघर्ष की।
"गीत गाता हूं मैं, गुनगुनाता हूं मैं, मैंने हंसने का वादा किया था कभी, इसलिए अब सदा मुस्कुराता हूं मैं" — किशोर दा की आवाज़ में यह गीत सुनकर शायद ही किसी का दिल न पिघला हो। पर कितने लोग जानते हैं कि यह गीत लिखने वाले शायर को इस एक गीत की सफलता के बाद भी अठारह साल तक संघर्ष की आग में तपना पड़ा था? आज देव कोहली जी की पुण्यतिथि है — 26 अगस्त 2023 को उनका निधन हो गया था। उनकी यह कहानी हमें शिशिर कृष्ण शर्मा जी के ब्लॉग "बीते हुए दिन" से मिली दुर्लभ जानकारियों पर आधारित है, जिसके लिए हम शिशिर जी के तहेदिल से शुक्रगुज़ार हैं।
रावलपिंडी से देहरादून तक — बंटवारे ने जिस बचपन को उजाड़ दिया
2 नवंबर 1942 को रावलपिंडी में सरदार जय सिंह और सोमवती के घर एक बच्चे का जन्म हुआ — यही देव कोहली थे, अपने माता-पिता की चौथी संतान, तीन भाइयों और दो बहनों के बीच। महज़ तीन साल की उम्र में देव कोहली ने अपनी मां को टीबी की बीमारी से खो दिया — उस वक्त उनकी सबसे छोटी बहन सिर्फ़ छह साल की थी। शुरुआती पढ़ाई रावलपिंडी के एक मदरसे में उर्दू माध्यम से हुई। समाज के दबाव में 1946 में पिता ने दूसरी शादी कर ली, और दूसरी पत्नी के साथ घूमने मसूरी आए तो देहरादून इतना भा गया कि वहीं बस गए। इधर देव कोहली और उनके भाई-बहन रावलपिंडी से दस मील दूर रावत में चाचा-चाची के पास रहने लगे।
अगले ही साल देश का बंटवारा हो गया, और चाचा-चाची इन सभी बच्चों को लेकर पहले दिल्ली, फिर देहरादून अपने पिता के पास पहुंचा गए, जहां तब तक पिता ने रेलवे स्टेशन के पास धामावाला में एक रेस्टोरेंट खोल लिया था। देव कोहली का दाख़िला गुरुनानक स्कूल में हुआ, जहां उन्होंने मैट्रिक तक पढ़ाई की — हालांकि मैट्रिक में वो फेल हो गए थे। इसके बाद पिता ओडिशा के राउरकेला चले गए, देव को भी साथ ले गए, वहां दो रेस्टोरेंट खोले और मुंबई में मोटर पार्ट्स के बिज़नेस में लगे एक और भाई को भी बुला लिया। पिता ने देव और उनके भाई को राशन की दुकान करा दी, पर दोनों का मन वहां नहीं लगा। आख़िरकार 1964 में दोनों भाई मुंबई आ गए।
पिता की मौत, गेस्ट हाउस की तनहाई, और वो पांच सौ रुपए जो ज़िंदगी भर याद रहे
मुंबई पहुंचने के कुछ ही समय बाद पिता की तबियत अचानक बिगड़ गई। भाई देखभाल के लिए राउरकेला लौट गए, देव मुंबई में अकेले रह गए, और जल्द ही पिता का निधन हो गया। अंतिम संस्कार देहरादून में हुआ, सभी भाई-बहन मौजूद रहे, बड़े भाई ने क्रियाएं पूरी कीं। पिता के दोनों रेस्टोरेंट संभालने के लिए देव के साथ मुंबई में रहने वाले भाई को वापस राउरकेला जाना पड़ा — देव पूरी तरह अकेले रह गए। वो पहले खार के एवरग्रीन गेस्ट हाउस में रहे, फिर दो-तीन साल बाद आशीष गेस्ट हाउस बना तो वहां शिफ्ट हो गए। लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से था, तो देव कोहली ने फ़िल्मी दुनिया के लोगों से मेलजोल बढ़ाना शुरू किया। इसी दौरान संगीतकार जी.एस. कोहली से उनकी गहरी दोस्ती हुई। एक दिन जी.एस. कोहली ने देव से एक गीत का दूसरा अंतरा लिखने को कहा — मुखड़ा और पहला अंतरा वो ख़ुद लिख चुके थे। देव ने वो अंतरा लिख दिया — "खुशी से जान ले लो जी, दिलो ईमान ले लो जी" — जो 1966 में लिखा गया था, पर फ़िल्म गुंडा में 1969 में रिलीज़ हुआ, आशा भोसले की आवाज़ में, बेला बोस पर फ़िल्माया गया एक कैबरे गीत। उस वक्त देव कोहली सिर्फ़ चौबीस साल के थे और घोर मुफ़लिसी में जी रहे थे। इस एक अंतरे के लिए जी.एस. कोहली ने उन्हें पांच सौ रुपए दिलाए — उस दौर में यह रक़म देव के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थी। देव कोहली ताउम्र इस एहसान को याद रखते रहे, और हमेशा कहते रहे कि असल में वो गीत जी.एस. कोहली का ही था, बस उनके बड़प्पन की वजह से दुनिया इसे देव कोहली का गीत मानती रही।
शंकर जी की एक बुलावे ने बदल दी ज़िंदगी, और एक नाम भी
धीरे-धीरे देव कोहली की पहचान अर्जुन अश्क, अनजान और नक्श लायलपुरी जैसे नामी गीतकारों से हो गई। बांद्रा के मशहूर गज़ेबो रेस्टोरेंट में यह सब चाय की चुस्कियों के साथ एक-दूसरे की रचनाएं सुनते-सुनाते वक्त गुज़ारते। एक दिन देव कोहली वहां अपनी एक नई ग़ज़ल पढ़ रहे थे, तभी पास की टेबल पर बैठे शंकर-जयकिशन वाले शंकर जी के मैनेजर ने उन्हें ध्यान से सुना और तारीफ़ करते हुए फ़ेमस स्टूडियो आकर शंकर जी से मिलने को कहा। उस वक्त शैलेंद्र जी का निधन हो चुका था, और शंकर-जयकिशन किसी अच्छे गीतकार की तलाश में थे।
जब देव कोहली फ़ेमस स्टूडियो पहुंचे और शंकर जी ने पूछा कि क्या वो गीत लिखते हैं, तो देव ने जवाब दिया कि वो तो सिर्फ़ ग़ज़लों के शायर हैं। शंकर जी ने उन्हें कुछ ग़ज़लें सुनाने को कहा, और सुनने के बाद बेहद प्रभावित होकर कहा कि इस सरदार जी में तो बहुत फ़ायर है, मिलते रहा करो। इसके बाद देव हर दूसरे-तीसरे दिन शंकर जी से मिलने लगे। एक दिन शंकर जी ने उन्हें एक सिचुएशन समझाई और मुखड़ा लिखने को कहकर लंच के लिए चले गए। कई और लेखकों से लिखवाया मुखड़ा पहले ही ख़ारिज हो चुका था। शाम तीन बजे जब शंकर जी लौटे, तो देव कोहली ने उन्हें सुनाया — "गीत गाता हूं मैं, गुनगुनाता हूं मैं, मैंने हंसने का वादा किया था कभी।" शंकर जी ने हारमोनियम खींचा और उसी संगीतमय माहौल में देव ने दो अंतरे भी लिख डाले।
1971 में रिलीज़ हुई फ़िल्म लाल पत्थर में किशोर कुमार की आवाज़ में यह गीत सुपरहिट साबित हुआ। यह दिलचस्प है कि इससे पहले लोग देव कोहली को "गुरुदेव कोहली" के नाम से जानते थे — यह नाम भी शंकर जी ने ही बदला, यह कहते हुए कि इतना बड़ा नाम पूरी स्क्रीन घेर लेगा। इसी शंकर जी के लिए देव कोहली ने 1975 की फ़िल्म संन्यासी के लिए भी एक गीत लिखा था — "मर गया पहरेदार शहर की चुंगी का, शहर में चल निकला है फ़ैशन लुंगी का" — जिसकी धुन तो बनी, पर वो गीत कभी रिकॉर्ड नहीं हुआ।
अठारह साल का सन्नाटा, और वो फ़िल्म जिसने आख़िरकार क़िस्मत बदल दी
एक सुपरहिट गीत लिखने के बावजूद देव कोहली का जीवन आसान नहीं हुआ। अगले अठारह साल उन्होंने सिर्फ़ संघर्ष में गुज़ारे। जगदीश जी, उषा खन्ना, सोनिक ओमी और विजय सिंह जैसे उस दौर के संगीतकारों के लिए गीत लिखते रहे, पर करियर कभी उड़ान नहीं भर पाया — बस घिसटता रहा। महीने में इक्का-दुक्का गीत रिकॉर्ड होता, जिससे किसी तरह गुज़ारा चलता। इसी दौर में, 1966 से, देव कोहली ने आनंद भाइयों — सतीश आनंद और देवराज आनंद — की मेट्रो प्रिंटिंग कंपनी में नौकरी भी शुरू कर दी थी, जो जी.एस. कोहली ने ही दिलवाई थी। यह नौकरी उन्होंने पूरे तेईस साल तक की। आख़िरकार 1989 में क़िस्मत ने करवट ली — सलमान ख़ान की फ़िल्म मैंने प्यार किया के लिए देव कोहली को गीत लिखने का मौक़ा मिला। फ़िल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई, और इसके गीत-संगीत को भी ज़बरदस्त पसंद किया गया। देव कोहली के लिखे "आते जाते हंसते गाते" और "आजा शाम होने आई, मौसम ने ली अंगड़ाई" जैसे गीत सुपरहिट हुए। इस कामयाबी के बाद देव कोहली ने तेईस साल पुरानी अपनी प्रिंटिंग वाली नौकरी छोड़ दी, और देखते ही देखते इक्कीस फ़िल्में साइन कर लीं। इसके बाद तो एक के बाद एक शानदार गीत आते गए — बाज़ीगर का "ये काली काली आंखें", इश्क़ का "मिस्टर लोवा लोवा", हम आपके हैं कौन का "माई नी माई मुंडेर पे", जुड़वा का "ऊंची है बिल्डिंग", राजू बन गया जेंटलमैन का "थाम खुशियों के जाम" और मैं प्रेम की दीवानी हूं का "ओ अजनबी मेरे अजनबी।"
मांसाहार से वैराग्य तक — वो सफ़र जो सिर्फ़ पांच रुपए की मूर्ति से शुरू हुआ
देव कोहली को जानने वाले बताते हैं कि वो अक्सर गेरुए वस्त्र पहनते थे, क्योंकि वो पूरी तरह अध्यात्म में डूब चुके थे। उनका मानना था कि लाल पत्थर वाला गीत असल में उन्होंने नहीं लिखा था — किसी अदृश्य शक्ति ने उनसे लिखवाया था। कभी मांसाहारी रहे देव कोहली उस गीत के तीन-चार साल बाद अचानक शाकाहारी बन गए — एक दिन अपने गेस्ट हाउस में मंगाया गया मांसाहारी खाना देखते ही उनके मन में विरक्ति पैदा हो गई, और अगले दिन मोहम्मद अली रोड के एक नॉनवेज होटल में भी वही महसूस हुआ। बस, उसी दिन से उन्होंने मांस खाना छोड़ दिया।
इसके बाद विद्याविहार स्टेशन के बाहर फुटपाथ पर एक मूर्ति बेचने वाले के पास देव कोहली को भगवान कृष्ण की एक प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्ति दिखी, जो धूप में चमक रही थी। उन्होंने वो मूर्ति सिर्फ़ पांच रुपए में ख़रीद ली और रोज़ उसकी पूजा करने लगे। इसी दौर में फ़िल्म गंगा की सौगंध के लेखक संतोष व्यास से उनकी दोस्ती हुई, जो रोज़ गीता का पाठ करते थे। देव कोहली भी उनके साथ गीता पढ़ने लगे, और धीरे-धीरे अध्यात्म में इतने डूब गए कि शराब पीना भी कब छूट गया, उन्हें ख़ुद पता नहीं चला। शिशिर कृष्ण शर्मा जी को दिए इंटरव्यू में देव कोहली ने यह भी बताया था कि एक दिन टी-सीरीज़ के दफ़्तर से घर लौटते वक्त अचानक उनका बदन कांपने लगा, उन्हें ध्यान की गहरी अनुभूति हुई, और उस दिन के बाद से वो रोज़ शाम छह से नौ बजे तक ध्यान करने लगे — जो अनुभूतियां उन्हें उस ध्यानावस्था में होतीं, वो उन्हें लिख लिया करते थे।
खैर, यह तो सबको पता है कि "मैंने प्यार किया" से लेकर "हम आपके हैं कौन" तक, देव कोहली के गीत आज भी हर भारतीय शादी-ब्याह की जान बने हुए हैं। पर कम ही लोग जानते हैं कि इन गीतों के पीछे एक ऐसा शख़्स था जिसने बंटवारे का दर्द झेला, गेस्ट हाउसों में तनहा रातें गुज़ारीं, और आख़िर में अध्यात्म की उस राह पर चल पड़ा जहां शब्द ख़ुद-ब-ख़ुद उतरते थे — जैसे कोई अदृश्य शक्ति उनसे लिखवा रही हो।