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Buzz · Controversy

बीस साल की No Entry में वो कौन सा किरदार था जिसे आख़िरी वक़्त पर पूरा दोबारा लिखना पड़ा?

कियान वर्मा 14 Jul 2026 9,217 views

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बीस साल की No Entry में वो कौन सा किरदार था जिसे आख़िरी वक़्त पर पूरा दोबारा लिखना पड़ा?

एक फ़िल्म जो शुरू में सिर्फ़ हंसाने के लिए बनी थी, आज बीस साल बाद भी टीवी पर चले तो लोग चैनल नहीं बदलते — यही No Entry की असली कामयाबी है, और इसके पीछे के क़िस्से उतने ही दिलचस्प हैं जितनी ख़ुद फ़िल्म।

2005 की बात है, और उस साल बॉक्स ऑफ़िस पर जो लिस्ट बनी, उसमें सबसे ऊपर एक नाम था — No Entry। चौबीस करोड़ के आसपास के बजट में बनी इस फ़िल्म ने घरेलू बाज़ार में क़रीब पैंतालीस करोड़ रुपए बटोरे, और इसे उस साल की सुपरहिट फ़िल्मों में गिना गया — 2005 की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली हिंदी फ़िल्म। इसके पीछे दूसरे नंबर पर रही यश राज की बंटी और बबली, जिसने साढ़े बारह करोड़ के आसपास के बजट में छत्तीस करोड़ रुपए से ज़्यादा कमाए। तीसरे नंबर पर प्रियदर्शन की गरम मसाला रही, सत्रह करोड़ के बजट में उनतीस करोड़ की कमाई के साथ। चौथे पायदान पर सलाम नमस्ते रही, जिसने छब्बीस करोड़ से ज़्यादा कमाए, और पांचवें नंबर पर रही मैंने प्यार क्यूं किया, जिसने साढ़े पच्चीस करोड़ के आसपास नेट कमाई की। यह पूरा साल दरअसल कॉमेडी फ़िल्मों का साल था — हर हिट फ़िल्म हल्के-फुल्के मनोरंजन की थी, भारी-भरकम ड्रामे की नहीं।

वो किरदार जो सेट पर ही दोबारा गढ़ा गया

फ़िल्म के डायरेक्टर अनीस बज़्मी ने कुछ अरसा पहले, फ़िल्म के बीस साल पूरे होने पर एक इंटरव्यू में इस सफ़र को याद किया। उन्होंने बताया कि सलमान ख़ान का रोल शुरू में एक "स्पेशल अपीयरेंस" जितना ही रखा गया था, पर जब सलमान ने फ़ुकेत में क्लाइमैक्स की कहानी सुनी, तो ख़ुद कह दिया कि इसे जल्दबाज़ी में मत निपटाना, आराम से शूट करना — इतना पसंद आया था उन्हें यह सीन। आख़िर में सलमान की शूटिंग पंद्रह दिन तक चली, और बज़्मी ख़ुद मानते हैं कि इस फ़िल्म की कल्पना सलमान के बिना नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उन्हें एक ऐसे करिश्माई हीरो की ज़रूरत थी जो बाक़ी दोनों हीरो को सबक़ सिखाता दिखे, और गानों में भी उतना ही जंचे।

पर सेट पर सबसे दिलचस्प कहानी फ़रदीन ख़ान के किरदार की रही। शुरुआती स्क्रिप्ट में फ़रदीन का किरदार वैसा नहीं था जैसा फ़िल्म में आख़िर में दिखा। कुछ दिन की शूटिंग के बाद अनीस बज़्मी को महसूस हुआ कि फ़रदीन की कॉमिक टाइमिंग बाक़ी कलाकारों के मुक़ाबले थोड़ी फीकी पड़ रही है — उनके रिएक्शन देर से आ रहे थे, बाक़ी एक्टर्स के साथ तालमेल ठीक से नहीं बैठ रहा था। बज़्मी फ़रदीन को फ़िल्म से हटाना नहीं चाहते थे, तो उन्होंने एक तरकीब निकाली — किरदार को ही दोबारा लिख डाला। इस बार शेखर उर्फ़ "सनी" का किरदार जानबूझकर धीमा और देर से रिएक्ट करने वाला बना दिया गया, ताकि फ़रदीन की टाइमिंग ख़ुद ही किरदार का हिस्सा बन जाए, कमज़ोरी न लगे। यह तरकीब बड़ी शानदार तरीक़े से काम कर गई — फ़िल्म देखने वालों में से किसी को अंदाज़ा तक नहीं हुआ कि यह किरदार आख़िरी वक़्त पर दोबारा गढ़ा गया था।

अनीस बज़्मी ने अपने पुराने इंटरव्यू में यह भी कहा था कि No Entry उनके करियर का चौथा डायरेक्टोरियल प्रोजेक्ट था, और पहली बार वो अपने पुराने साथी अजय देवगन के बिना कोई फ़िल्म बना रहे थे। उन्होंने याद किया कि 2005 तक प्रियदर्शन की फ़िल्मों की वजह से क्लीन कॉमेडी का एक नया दौर शुरू हो चुका था, और उससे एक साल पहले इंद्र कुमार की मस्ती ने भी इस अंदाज़ की कॉमेडी को मक़बूल बनाया था — पर No Entry ने अपना अलग ही रास्ता बनाया और आज तक उसी राह पर चलने वाली फ़िल्में बनती रहती हैं। बज़्मी का यह भी कहना था कि आज भी जब यह फ़िल्म टीवी पर चलती है, तो उन्हें लोगों के फ़ोन आते हैं कि उन्होंने इसे कितनी बार देखा और कितना एन्जॉय किया।

वो विलेन जो कभी फ़िल्म में था ही नहीं

जब फ़िल्म की चर्चा मीडिया में ज़ोरों पर थी, तब एक अफ़वाह ख़ूब उड़ी — कहा जा रहा था कि संजय कपूर को फ़िल्म में खलनायक के तौर पर साइन किया गया था, बिपाशा बसु के अपोज़िट। कहते हैं कि शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले उनका रोल स्क्रैप कर दिया गया, और किन्हीं वजहों से उन्हें फ़िल्म से बाहर कर दिया गया। यह बात इतनी फैली कि सालों बाद भी फ़िल्म की ट्रिविया लिस्ट में इसका ज़िक्र मिलता है। मगर प्रोड्यूसर बोनी कपूर ने ख़ुद इस दावे को साफ़ तौर पर ग़लत और बेबुनियाद बताया। उनका कहना था कि कहानी में कभी ऐसा कोई किरदार लिखा ही नहीं गया था, तो हटाने का सवाल ही नहीं उठता। दिलचस्प बात यह है कि यह अफ़वाह इतनी मज़बूती से जमी कि आज भी कई जगह इसे "तथ्य" की तरह पेश किया जाता है — जबकि ख़ुद प्रोड्यूसर की सफ़ाई मौजूद है।

सोचिए ज़रा — कैसे एक फ़िल्म जो कभी बनी ही नहीं, वो भी इंडस्ट्री की गॉसिप मिल का हिस्सा बन जाती है? यही तो पुरानी बॉलीवुड पत्रकारिता का जादू था। किसी को पक्का पता नहीं होता था कि क्या सच है, क्या झूठ — बस एक बात कही जाती, फिर दूसरी पत्रिका उसे उठा लेती, फिर तीसरी उसमें अपना तड़का लगा देती। संजय कपूर की यह कहानी भी शायद ऐसी ही किसी शुरुआती अटकल से निकली थी, जो बाद में सच जैसी लगने लगी।

तीन हीरो, एक घर — और अब एक दरार

No Entry की कास्टिंग के पीछे भी एक पुराना रिश्ता छुपा था। अनिल कपूर की होम प्रोडक्शन वाली इस फ़िल्म में फ़रदीन ख़ान को लेना कुछ हद तक उस पुराने एहसान को लौटाना भी माना जाता है — बरसों पहले फ़रदीन के पिता फ़िरोज़ ख़ान ने एक नए-नवेले अनिल कपूर को अपनी फ़िल्म जांबाज़ में साइन किया था। अनीस बज़्मी और अनिल कपूर की दोस्ती भी पुरानी थी, वो पहले भी अपराधी, लाडला, अंदाज़, मिस्टर आज़ाद और दीवाना मस्ताना जैसी फ़िल्मों में साथ काम कर चुके थे। यही वजह थी कि जब अनिल के भाई बोनी कपूर ने No Entry बनाने की सोची, तो उन्होंने भी बज़्मी को ही डायरेक्टर के तौर पर चुना।

अब बात करते हैं आज की — क्योंकि यह क़िस्सा अभी ख़त्म नहीं हुआ है। No Entry के सीक्वल की चर्चा बरसों से चल रही है, कभी शूटिंग शुरू होने की ख़बर आती है, तो कभी टलने की, तो कभी सिरे से फ़िल्म न बनने की। बज़्मी ख़ुद कई बार कह चुके हैं कि स्क्रिप्ट तैयार है, सलमान को कहानी पसंद भी आई थी — पर हरी झंडी देना प्रोड्यूसर का काम है। और हाल ही में जब बोनी कपूर ने सीक्वल का ऐलान किया, तो कहा जाता है कि इसमें नई कास्ट लाने की बात पर अनिल कपूर और बोनी कपूर के बीच रिश्तों में खटास आ गई। अनीस बज़्मी ने भी इस पर अपनी राय रखी, यह कहते हुए कि No Entry में अनिल की भागीदारी सिर्फ़ अभिनय तक सीमित नहीं थी, वो फ़िल्म से गहराई से जुड़े थे — इसलिए उनका सीक्वल में शामिल न होना उन्हें स्वाभाविक तौर पर खटकना ही था। बज़्मी ने साफ़ कहा कि वो इस पारिवारिक झगड़े में दख़ल नहीं देना चाहते।

खैर, यह तो सबको पता है कि No Entry जैसी फ़िल्में हर पीढ़ी में नई ऑडियंस ढूंढ लेती हैं। बीस साल पहले जो फ़िल्म तीन शरारती दोस्तों की कहानी लेकर आई थी, वो आज भी टीवी पर उतनी ही ताज़ा लगती है। सीक्वल बनेगा या नहीं, यह सवाल अभी भी हवा में लटका है — पर जब तक इसका जवाब नहीं मिलता, फ़ैन्स पुरानी फ़िल्म को ही बार-बार देखकर संतोष कर रहे हैं।